Innocent Nand Story : रेखा अपने पति पार्थ के साथ एक फ्लेट में रहती थी। पार्थ के माता पिता नहीं थे, उसकी एक छोटी बहन संजना थी, जिसकी शादी हो चुकी थी।
पार्थ एक बड़ी कंपनी में नौकरी करता था। वह अपनी सैलरी लाकर रेखा को देता था। महीने का खर्च चलाने के बाद रेखा के पास बहुत से पैसे बच जाते थे।
रेखा हर महीने कपड़े, गहने खरीदती थी। अभी कुछ दिन पहले ही पार्थ ने नई गाड़ी ली थी।
एक दिन रेखा घर पर ही थी। तभी डोर बेल बजी।
रेखा: अरे इस समय कौन आ गया। चैन से सोने भी नहीं देते।
रेखा दरवाजा खोलती है, सामने उसकी नन्द संजना अपने बेटे रवि के साथ खड़ी थी।
रेखा: अरे दीदी आप, अचानक कैसे आ गईं।
संजना: बस भाभी, आपसे और भैया से मिलने का मन हुआ तो मैं चली आई।
रेखा: आईये अन्दर बैठ कर बातें करते हैं। आप बैठिये मैं आपके लिये पानी लाती हूं।
रेखा, संजना और रवि को पानी देती है। वह संजना के पास बैठ कर बातें करने लगती है।
रेखा: और बताईये दीदी आपके ससुराल में सब कैसे हैं?
संजना: सब ठीक हैं भाभी, आप बताईये भैया कैसे हैं?
रेखा: बिल्कुल बढ़िया हैं। हमने पिछले महीने ही नई गाड़ी ली है। आप फोन कर देतीं तो ये आपको लेने आ जाते।
तभी रवि बीच में बोल पड़ता है।
रवि: बता कहां से देती आज सुबह ही तो लड़ाई हुई थी पापा से।
रेखा: दीदी ऐसी क्या बात हो गई, कि आपको अचानक आना पड़ा।
संजना: भाभी आपको नहीं पता, ये रोज शराब पीकर आते हैं। मुझे मारते हैं और भैया से पैसे लाने के लिये बोलते हैं। इन्हें पता लग गया कि आप लोगों ने गाड़ी ली है। तब से दहेज में गाड़ी न मिलने के लिये मुझे ताने मारते रहते हैं।
रेखा का दिमाग खराब हो गया। वह सोचने लगी – ‘‘हे भगवान ये तो अपना घर छोड़ कर आ गई। अब ये यहां रहेगी, तो मैं पार्थ से पैसे बचाकर जो शॉपिंग करती हूं। यह सब उन्हें बता देगी। पता नहीं कहां से आ टपकी।’’
संजना: अरे भाभी आप क्या सोचने लगीं?
रेखा: नहीं दीदी कुछ नहीं बस आपके घर के बारे में ही सोच रही थी।
शाम को पार्थ घर आया। अपनी बहन को देख कर वह बहुत खुश हुआ। संजना ने उसे सारी बात बता दी।
पार्थ: बहन तू चिंता मत कर। यह घर भी तो तेरा है। अब तू यहीं रह, जब तक जीजाजी सुधर नहीं जाते। तुझे वापस जाने की कोई जरूरत नहीं है।
रेखा दोंनो की बातें सुन रही थी। उसे मन ही मन में जलन हो रही थी।
रात के समय सब खाना खाकर सोने चले गये। रेखा ने मौका देख कर पार्थ से बात की।
रेखा: आपको नहीं लगता दीदी को यहां ज्यादा दिन नहीं रुकना चाहिये। अकेले में तो जीजाजी और ज्यादा शराब पियेंगे।
पार्थ: कैसी बात करती हो। वो चाहें जो करे, लेकिन मैं अपनी बहन को इस हाल में वहां नहीं भेज सकता।
रेखा आगे कुछ बोल नहीं पाई लेकिन उसकी नींद उड़ चुकी थी। वह पूरी रात यही सोचती रही कि संजना को कैसे अपने घर से भगाया जाये।
दो तीन दिन तक तो सब ठीक चलता रहा। रेखा को अब किचन में ज्यादा काम करना पड़ता था। क्योंकि संजना उसे हर बात पर टोक देती थी। उपर से रवि बहुत ज्यादा शैतानी करता था।
तीन दिन बाद रेखा ने संजना से कहा
रेखा: दीदी मुझे तो इतना काम करने की आदत नहीं है। आपको यहां रहना है तो मेरे काम में हाथ बटाना पड़ेगा। सुबह का खाना मैं बना लूंगी। शाम का खाना और बरतन आप कर लेना।
संजना: ठीक है भाभी मैं कर लूंगी।
रेखा: हे भगवान मैं तो सोच रही थी इसे बुरा लग जायेगा। लेकिन मुफ्त का खाना खाने के लिये यह तो काम भी करने को तैयार हो गई।
रेखा: दीदी ये बात अपने भैया को मत बताना। नहीं तो वे गुस्सा हो जायेंगे।
संजना घर का काम करने लगी। धीरे धीरे रेखा ने सारा काम संजना पर डाल दिया और खुद कोई न कोई बहाना बना कर पलंग पर लेटी रहती थी।
रेखा अब भी बहुत परेशान थी। वह संजना को घर से निकालना चाहती थी।
एक दिन रेखा ने संजना को साफ साफ कह दिया।
रेखा: दीदी आप कब तक हमारे उपर बोझ बन कर रहेंगी। आपको पता है इनकी कमाई इतनी कम हो गई है। इन्हें कभी भी नौकरी से निकाला जा सकता है। उपर से गाड़ी की ई एम आई। ऐसे में हम आपका बोझ कब तक उठायेंगे।
संजना: भाभी मेरे से तो भैया ने कभी कुछ नहीं कहा।
रेखा: वो आपसे कैसे कहते कि आप चली जाओ। ये तो आपको सोचना चाहिये कि अपना ससुराल छोड़ कर आप पीहर में पड़ी हो।
संजना को बहुत बुरा लग जाता है। अगले दिन वह पार्थ के जाने के बाद घर से निकल जाती है। उसे एक वृद्धा आश्रम में नौकरी मिल जाती है। वहां उसे बुर्जुगों की सेवा का काम मिल जाता है। वहीं रहने खाने का भी इंतजाम हो जाता है।
संजना पार्थ को बिना बताये उस वृद्धा आश्रम में पहुंच जाती है। रेखा बहुत खुश थी, लेकिन अब वो पार्थ को कैसे मनाये यही सोच रही थी।
शाम को पार्थ आया। उसने देखा कि संजना नहीं है। न ही रवि कहीं नजर आ रहा है।
पार्थ: रेखा, संजना कहां है?
रेखा: दीदी को जीजाजी ले गये। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। वो आये थे। उन्हें ले गये।
पार्थ: तुमने मुझे फोन क्यों नहीं किया। मैं आकर उनसे बात तो करता।
रेखा: वो बहुत पछता रहे थे। आपसे नजरे भी नहीं मिलाना चाहते थे। बार बार माफी मांग रहे थे।
रेखा के झूठ को पार्थ ने सच मान लिया।
पार्थ: चलो यह अच्छा हुआ, कि अब मेरी बहन सुखी रहेगी।
रेखा बहुत खुश थी, उसकी नन्द जा चुकी है। वह अब पहले की तरह ही घूमने जाती, शॉपिंग करती थी।
एक दिन पार्थ ऑफिस से नीचे आया तो देखा। संजना एक कैंप में बैठी है और लोगों से बुर्जुगों के लिये डोनेशन मांग रही थी।
पार्थ उसके पास गया।
पार्थ: बहन तू यहां क्या कर रही है। क्या फिर जीजाजी से झगड़ा हो गया।
संजना कुछ बोल न सकी।
पार्थ को सब समझ में आ गया। वह उसी समय संजना और रवि को लेकर घर आ गया। कुछ देर में रेखा शॉपिंग करके वापस आई। पार्थ और संजना को देख कर वह घबरा गई।
पार्थ: रेखा तुम अपना सामान पैक कर लो और अपने पीहर चली जाओ।
रेखा पार्थ के पैरों में गिर जाती है।
संजना: पार्थ तुम मेरे से बड़े हो, लेकिन आज तुम भी वही कर रहे हो जो तुम्हारे जीजाजी ने मेरे साथ किया। माफ कर दो भाभी को।
रेखा: दीदी मुझे माफ कर दो। मुझे अपने कर्मों की सजा मिल रही है।
संजना: नहीं भाभी। मैं ही तुम लोगों पर बोझ बन गई थी। पार्थ भाभी को कुछ नहीं कहना।
यह कहकर संजना वहां से चली गई। रेखा ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन उसे अब वृद्धा आश्रम में आश्रय मिल गया था।
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