नई बहु और सास का वनवास | Saas Bahu Story in Hindi

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Saas Bahu Story in Hindi : एक शहर में अमित अपनी मॉं सुधा के साथ रहता था। एक दिन अमित सो रहा था तभी उसकी मॉं उसे जगाने आती हैं।

सुधा जी: बेटा अभि तक सो रहा है ऑफिस नहीं जाना है तुझे।

अमित: मॉं अभी सोने दो कुछ देर और अभी टाईम ही क्या हुआ है।

सुधा जी: बेटा नौ बजने वाले हैं चल जल्दी से उठ कर तैयार हो जा।

अमित तैयार होकर ऑफिस चला जाता है। सुधा जी जल्दी जल्दी घर का काम निबटा कर अपनी सहेली कविता को फोन मिलाती हैं।

सुधा जी: कविता कैसी है

कविता: हॉं सुधा मैं ठीक हूं तू बता कैसी है।

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सुधा जी: मैं तो बिल्कुल ठीक हूॅं। ये बता मैंने तुझे कहा था अमित के लिये एक अच्छी सी लड़की ढूंढने के लिये तूने कुछ किया या नहीं।

कविता: हॉं मैंने बात की थी। मेरी दूर की रिश्तेदारी में एक लड़की है बहुत ही गुणवान है। तुझे और अमित को जरूर पसंद आयेगी।

सुधा जी: तो जल्दी से बात चला न और हॉं अगर उसकी फोटो तेरे पास हो तो मुझे भेज दे।

कविता: जरा सब्र रख मैं एक दो दिन में भेजती हूॅं।

दो दिन बाद कविता लड़की वालों से बात करके बताती है। अमित और संजना आपस में एक दूसरे से मिलते हैं। सभी को रिश्ता पसंद आ जाता है। कुछ ही दिनों में शादी हो जाती है।

शादी के बाद सुधा जी बहुत खुश रहती थीं।

एक दिन सुधा जी किचन में खाना बना रहीं थी। तभी वहां संजना आती है।

सुधा जी: बहु कुछ चाहिये तुम्हें।

संजना: जी नहीं मम्मी जी मेरे होते आप काम करें यह ठीक नहीं है मैं चाहती हूॅं आप आराम करें और सारा काम मैं करूं।

सुधा जी: बहु तुम अभी अभी तो आईं हो। थोड़े दिन आराम करो, बाद में तुम्हें ही तो यह सब संभालना है।

संजना: नहीं मांजी मैं ऐसे नहीं बैठ सकती मैं आपकी मदद करती हूं धीरे धीरे मैं सब काम सीख जाउंगी।

संजना सुधा जी का हाथ बटाने लगती है।

धीरे धीरे संजना पूरे घर की जिम्मेदारी संभालने लगती है।

सुधा जी के पास अब कोई काम नहीं बचा था। वे केवल बाजार से सब्जी या अन्य घर का सामान लाती थीं।

एक दिन सुधा जी बाहर से सब्जी लेकर आती हैं। वे जैसे ही घर के अन्दर पहुंचने वाली होती हैं उनके कानों में आवाज आती है।

संजना अपनी सहेलियों के साथ बैठी बात कर रही थी।

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संजना: अमिषा तू तो बहुत खुशनसीब है जो तेरी सास गॉव में रहती है। तू यहां मौज मारती है। एक मैं हूं जो सारा दिन नौकरानी की तरह काम करती हूॅं और मेरी सास मौज में रहती है।

अमिषा: यह सब तो तूने ही अपने हाथ में लिया है।

संजना: अरे वो तो एक चाल थी अमित को वश में करने के लिये। अगर मैं ऐसा नहीं करती तो वो तो हमेशा मॉं के पल्लू से बंधे रहते। अब तो मुझे उस दिन का इंतजार है जब अमित पूरी सैलरी मेरे हाथों में देगें।

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सुधा जी यह सब सुन कर सन्न रह जाती हैं। जिस बहु को वो इतना सीधा समझ रहीं थी, वह तो उनसे इतनी नफरत करती है।

सुधा जी के आते ही सब सहेलियों चुप हों गईं।

सुधा जी को देखते ही संजना बोली –

संजना: अरे मांजी आप आ गईं, मैं अभी अपनी सहेलियों से आप ही की तारीफ कर रही थी।

सुधा जी चुपचाप किचन में चली जाती हैं।

अमिषा: संजना लगता है तेरी सास ने सब कुछ सुन लिया।

संजना: अच्छा है उनका भ्रम जितनी जल्दी टूट जाये। उन्हें भी तो पता होना चाहिये कि बेटे की शादी के बाद उनकी जिन्दगी में दखल नहीं देना चाहिये।

सुधा जी किचन में सारी बातें सुन रहीं थीं। उनकी आंखों से टपटप आंसू बह रहे थे। वे सीधे अपने कमरे में गईं और अपने पति कमलनाथ जी तस्वीर के सामने फूट फूट कर रोने लगीं।

सुधा जी: आप ठीक कहते थे। कि बच्चों से ज्यादा उम्मीद नहीं रखनी चाहिये। आपने कितना कहा कि घर गृहस्थी छोड़ कर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ। लेकिन मैं अपने इकलौते बेटे की परवरिश में सब भूल गई। अब क्या होगा मैं कहां जाउंगी। बहु तो मेरे साथ रहना नहीं चाहती।

सुधा जी पलंग पर लेटी यही सोच सोच कर रो रहीं थी।

अगले दिन अमित के ऑफिस जाने के बाद उन्होंने संजना से बात की।

सुधा जी: बहु मैंने कल तुम्हारी सारी बातें सुन लीं। ये सब तुम्हारा ही है। इसमें चालबाजी करने की क्या जरूरत थी। आज से अमित सैलरी भी तुम्हें ही देगा। मैं बस घर में शांती चाहती हूॅं।

संजना: मांजी वो आपके रहते तो हो नहीं सकती। मैं अकेले रहना चाहती हॅंू मौज मस्ती करना चाहती हॅंू। लेकिन अमित आपके बगैर नहीं रहेगा।

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सुधा जी को घक्का लगा। वे अपना सर पकड़ कर सोफे पर बैठ गईं।

सुधा जी: बहु तुम आखिर चाहती क्या हों।

संजना: मांजी मैं चाहती हूं, कि आप अमित को बिना बताये किसी वृद्धा आश्रम में चली जायें। अमित को मैं कोई न कोई बहाना बना कर समझा दूंगी। आप चाहें तो हमारी खुशियां हमें दे सकती हैं।

सुधा जी: लेकिन बेटी मैंने तो कभी तुझसे लड़ई तक नहीं की।

संजना: मैं किसी के साथ एडजेस्ट नहीं करना चाहती आप कल ही चली जाईयेगा। जो कुछ आपको ले जाना हो ले जा सकती हैं। लेकिन अगर आपने अमित को इस बारे में कुछ बताया तो अच्छा नहीं होगा।

संजना जी जैसे जड़वत हो गईं थी। जिस घर को उन्होंने और उनके पति ने बड़े प्यार से सजाया था वो एक पल में पराया हो गया। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।

वे चुपचाप अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गईं। आज उनका मन कर रहा था। कोई चमत्कार हो जाये और उनके प्राण इसी घर में निकल जायें।

रात को अमित के सो जाने के बाद संजना सुधा जी के कमरे में आती है।

संजना: मांजी आपने अपना सामान पैक कर लिया?

सुधा जी: बहु मुझे घर से मत निकाल मैं यहीं एक कौने में पड़ी रहूंगी।

संजना: आपको एक बात समझ नहीं आती आपके रहते अमित कभी भी पूरी तरह से मेरा नहीं हो सकता।

अगले दिन अमित के जाने के बाद संजना सुधा जी के लिये कैब बुक करा कर उन्हें वृद्धा आश्रम भेज देती है।

शाम को जब अमित आता है

संजना: अमित आज मैंने तुमसे पूछे बगैर मांजी को तीर्थ यात्रा पर भेज दिया। वो मेरी सहेली है न उसके पापा ने टूर बुक किया था पूरी बस गई है आज आखिरी दिन था। दो महीने के लिये वे गईं हैं।

अमित: संजना मुझे फोन तो कर सकती थीं पता नहीं मॉं के पास पैसे भी हैं या नहीं।

संजना: अमित मैंने उन्हें पैसे दे दिये हैं और सारा इंतजाम टूर वाले कर रहे हैं चिन्ता की कोई बात नहीं है।

इसी तरह दो महीने बीत जाते हैं।

एक दिन संजना रोते हुए अमित के पास आती है।

संजना: अमित बहुत बुरी खबर है तीर्थ यात्रा पर जाने वाली बस का एक्सीडेंट हो गया उसमें कोई नहीं बचा।

यह सुनकर अमित रोने लगता है।

अमित: मुझे टूर वालों का नम्बर दो मैं वहां जाकर देखना चाहता हूं।

संजना: अमित मैंने सब पता कर लिया बस हजारो फुट गहरी खाई में गिरगई किसी का कुछ पता नहीं लगा।

अमित का दिल टूट जाता है वह कई दिन तक मॉं को याद करके रोता रहता है।

कुछ दिन बाद संजना उसे समझाती है।

संजना: अमित जो होना था हो गया। शायद किस्मत को यही मंजूर था।

कुछ दिन में सब सामान्य हो जाता है।

एक दिन अमित कहीं जा रहा था। तभी उसे एक मन्दिर दिखाई देता है। मन्दिर को देख कर उसे मॉं की याद आ जाती है। हर छुट्टी के दिन मॉं उसे इस मन्दिर में भगवान का आशीर्वाद दिलाने लाती थीं।

यह सोच कर वह मन्दिर में चला जाता है। जब वह बाहर निकलता है तो देखता है मन्दिर के बाहर पीपल के पेड़ के नीचे कुछ भिखारी बैठे थे। अमित उन्हें पैसे देने लगता है।

तभी वह देखता है। एक मैले कुचैले कपड़े में उसकी मॉं बैठी भीख मांग रही थी।

अमित: मॉं तुम यहां कैसे तुम तो तीर्थ यात्रा पर गई थीं।

सुधा जी: बेटा संजना ने मुझे घर से निकल जाने के लिये कहा और वृद्धा आश्रम भिजवा दिया। वो अकेले रहना चाहती थी। वृद्धा आश्रम में उन्हीं लोगों को रखते हैं जिनके घरवाले खर्चा देते हैं। संजना ने एक महीने तो पैसे भिजवाये उसके बाद पैसे भेजने बंद कर दिये। वृद्धा आश्रम वालों ने मुझे निकाल दिया। तब से यहीं रहती हूं। कोई कुछ दे जाता है तो खा लेती हूं। तू कैसा है?

अमित की आंखों से टप टप आंसू बह रहे थे। वो मॉं को लेकर सीधा घर आ जाता है।

सुधा जी को देखते ही संजना घबरा जाती है।

अमित: संजना तुमने मेरी मौं को मरा बता कर झूठ बोला अब तुम इस घर में एक मिनट नहीं रह सकती।

संजना: ये तो खुद ही यहां नहीं रहना चाहती थीं।

अमित: चुप रहो कितना झूठ बोलोंगी। चलो निकलो यहां से।

सुधा जी: बेटा बहु तो घर की लक्ष्मी होती है इसे घर से मत निकाल मेरा क्या है मैं कहीं भी चली जाउंगी। तुम दोंनो सुख से रहो।

संजना: मांजी मुझे माफ कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मेरी यही सजा है कि मैं इस घर से चली जाउं।

सुधा जी: नहीं मेरे होते यह नहीं हो सकता। अमित इसे माफ कर दे और खबरदार जो बहु को कभी घर से निकल जाने को कहा।

संजना सुधा जी के पैरों में गिर जाती है।

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Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.