बहु या बेटी : सत्या बहु भाग भाग कर सारी तैयारी कर रही थी। तभी किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा – ‘‘बहु बहुत जल्दी है मायके जाने की।’’ सत्या ने पलट कर देखा तो उसकी सास धनवती जी खड़ीं थीं।
‘‘हां मांजी बड़ी मुश्किल से तो यह समय आया है जब मुझे अपने घर जाने का मौका मिल रहा है आपको तो पता ही है घर गृहस्थी से छुट्टी नहीं मिलती आज आपके बेटे ने मुझे पूरे एक सप्ताह की छुट्टी दी है। न जाने आज उन्हें मुझ पर कैसे तरस आ गया।’’ – सत्या ने चहकते हुए कहा।
आज सत्या की शादी को लगभग बारह वर्ष हो गये इन बारह वर्षों में मुश्किल से दो या तीन बार ही वह अपने मायके जा पाई थी। वो भी किसी फंक्शन में उसके पति बिमल ने कभी सत्या को जाने की परमीशन नहीं दी। क्योंकि उनके बूढ़े मां बाप की देखभाल करने वाला और कोई नहीं था। बड़े भैया भाभी तो कभी कभी बस मिलने आते थे। मां बाप को छोटे बेटे के भरोसे छोड़ कर वे मौज से रह रहे थे।
सत्या को इससे कोई परेशानी नहीं थी। क्योंकि उसके सास ससुर उसे बहुत चाहते थे। सत्या भी पता नहीं कब बहु से बेटी बन गई। उसे पता ही नहीं चला दिन भर काम में व्यस्त रहती थी। सास ससुर की एक एक चीज का ध्यान रखना। जहां तक की वह अपने ससुर जी को कभी कभी डाट भी देती थी जब वे चुपचाप कभी कभी मीठा खाने की कोशिश करते। इस प्यार भरी डाट पर वे मुस्कुरा कर बस इतना ही कहते। लगता है मेरी मां वापस आ गई।
लेकिन आज सब कुछ भूल कर सत्या अपने मायके जाने के लिये तैयार हो रही थी। बिमल उसे खुद छोड़ने जा रहे थे। जाते समय सत्या ने अपने सास ससुर के पैर छूते हुए कहा – ‘‘पापा जी आप परहेज से रहना और मीठा तो बिल्कुल मत खाना। मम्मी जी मैंने मेड को बोल दिया है वो आप दोंनो को समय पर दवाई दे देगी, आप अक्सर दवाई लेना भूल जाती हैं। जब मैं वापस आउं तो आप दोंनो ऐसे ही स्वस्थ मिलने चाहिये।’’
लेकिन बाबूलाल जी और धनवती जी दोंनो के चेहरे उदास थे। इस उदासी का कारण सत्या भी नहीं समझ पाई उसे लगा जैसे वे उसके जाने से दुःखी हैं।
सत्या उनका आशीर्वाद लेकर जल्दी से गाड़ी में बैठ कर चली गई। उसके जाने के बाद बाबूलाल जी ने धनवती से कहा – ‘‘चल अब मेरा भी सामान पैक कर दे। शायद तेरा मेरा साथ यहीं तक था।’’
धनवती जी ने कहा – ‘‘ऐसा मत कहिये मैं भी आपके साथ चलती हूं। नहीं तो हम दोंनो किसी वृद्धा आश्रम में रहने चलते हैं।’’
बाबूलाल जी ने अपने दर्द को सम्हालते हुए कहा – ‘‘नहीं धनवती तू भी यहां नहीं रहेगी तो सत्या परेशान हो जायेगी। मैं ही चला जाता हूं।’’
कुछ दिन से उनके बड़े बेटे सुरेश और बिमल में बहस चल रही थी। बिमल चाहता था, कि मां बाप की जिम्मेदारी वे भी उठायें। लेकिन सुरेश नहीं मान रहा था। तभी दोंनो मिल कर समझौता किया कि पापा को सुरेश रख लेगा और मां को बिमल, लेकिन सत्या के रहते ये संभव नहीं था। इसलिये बिमल ने बहाने से सत्या को उसके मायके भेजा था।
अगले ही दिन सुरेश अपने पिता को लेने आ गया। धनवती जी का रो रो कर बुरा हाल था। दुःखी मन से बाबूलाल जी सुरेश के साथ चले गये।
धनवती जी को लगने लगा जैसे उनकी जिन्दगी का मकसद खत्म हो गया है वे चुपचाप अपना कमरा बंद करके बैठी रहती थीं। न खाने की सुध न दवाई की। उधर यही हाल बाबूलाल जी का भी था।
एक दिन बिमल ने सत्या को फोन किया – ‘‘सत्या मम्मी की तबियत ठीक नहीं है। तुम जल्दी से आ जाओ। उन्हें अस्पताल में एडमिट किया है।’’
सत्या जल्दी से अस्पताल पहुंची – ‘‘मांजी क्या हो गया आपको। डॉक्टर साहब ये तो अच्छी भली थीं।’’
‘‘इन्होंने खाना पानी छोड़ दिया था, जहां तक कि दवाई भी नहीं ली है। करीब तीन दिन से कुछ नहीं खाया है।’’ – डॉक्टर की बात सुनकर सत्या मांजी की ओर देख कर बोली – ‘‘क्या हुआ मांजी ये सब क्या है कोई बात हुई है। मुझे बताईये।’’
‘‘बस बेटी तू कब बहु से बेटी बन गई पता नहीं चला। तूने हमारा बहुत ध्यान रखा है बस एक उपकार कर दे। अपने ससुर का ध्यान रखना मेरे बाद वो बहुत अकेले हो जायेंगे। मैं उनकी जिम्मेदार तुझे सौंप कर जाना चाहती थी। इसलिये जिन्दा हूं।’’
सत्या इससे पहले कुछ समझ पाती। धनवती जी की गर्दन एक ओर लुढ़की गई।
सत्या और बिमल जब मां को लेकर घर पहुंचे तो देखा। बाबू जी सुरेश की गाड़ी से उतर रहे थे। सत्या सब समझ गई। उसने गुस्से से अपने पति बिमल को देखा और बोली – ‘‘जो पाप आपने किया है उसका प्राश्चित तो मैं भी नहीं कर सकती। इतना बड़ा धोखा मुझसे और अपने माता पिता से इतनी नफरत। हे भगवान अब हमें कौन बचायेगा। मां का तो आपने दिल दुःखाया है, उसका प्रयश्चित करने के लिये आपको न जाने कितने जन्म लेने होंगे।’’
बिमल बस फूट फूट कर रो रहा था -‘‘मुझे क्या पता था ये सब हो जायेगा।’’
इधर बाबूलाल जी गुमसुम से बैठे थे, वो न रो रहे थे, न किसी से बात कर रहे थे। सत्या ने जाकर उन्हें संभाला तो वो बोले – ‘‘बेटी मेरा आशीर्वाद हमेशा तेरे साथ रहेगा। बस अब मैं जी नहीं पाउंगा।’’- यह कह कर वे सत्या की गोद में लुढ़क गये। सत्या ने उन्हें उठाने की कोशिश की लेकिन बाबू जी जा चुके थे।















