पल्टूराम का मौन | Hindi Story for Kids Never Lie

Hindi Story for Kids Never Lie

Hindi Story for Kids Never Lie : शाहपुर गांव में एक आलसी आदमी रहता था। जिसका नाम गोविन्द था। लेकिन गांव में वह पल्टूराम के नाम से मशहूर था।

पल्टूराम उसका नाम क्यों पड़ा इसकी वजह थी। उसका झूठ बोलना और अपनी बात से पलट जाना। एक दिन पल्टूराम एक नाई की दुकान पर पहुंचा –

पल्टूराम: अरे भाई मेरे बाल काट दो।

नाई: पल्टूराम पिछली बार तेरे बाल काटे थे तूने कहा था। अभी पैसे खुले करा कर ला रहा हूं। इस बात को दो महीने हो गये। पहले पिछले पैसे दे फिर आज के पैसे दे तब बाल काटूंगा।

पल्टूराम: अरे भाई तुम्हें नहीं पता। जब में बाल कटवा कर पैसे खुले करवाने गया तो मेरे पैसे गिर गये। तुम इस बार बाल काट दो मैं आज के पैसे दे दूंगा पिछले पैसे कल दे जाउंगा।

नाई ने पल्टू राम के बाल का दिये लेकिन जब पैसे देने की बार आई –

पल्टू राम: भाई पैसे तो मैं दे ही दूंगा। लेकिन तुम कितनी मेहनत करते हो सारा दिन खड़े रहते हो थक जाते होगे। चलो हम दोंनो चाय पीने चलते हैं।

नाई: नहीं मैं दुकान छोड़ कर कैसे जा सकता हूं।

पल्टूराम: ओहो चलो मैं हम दोंनो के लिये चाय लेकर आता हूं।

पल्टूराम चाय लेने निकला और नाई इंतजार करता रहा वह वापस नहीं आया। नाई समझ गया कि पल्टू राम फिर चकमा दे गया।

इसी तरह पल्टू राम कई गांव वालो को धोखा दे चुका था। अब तो लोग पल्टू राम को देखते ही दूर हो जाते थे। कई लोगों से पैसे उधार लेकर वह पलट जाता कि उसने कब पैसे उधार लिये।

एक दिन गांव के कुछ लोग पल्टू राम के घर पहुंचे। घर पर पल्टू राम की मां थी।

मुखिया: काकी हम तुम्हारी बहुत इज्जत करते हैं। लेकिन तुम्हारे बेटे ने गांव वालों का जीना मुश्किल कर रखा है। इसे समझाओ नहीं तो हम इसे गांव से निकाल देंगे।

मां: माफ करना मुखिया जी मैं तो इसे बहुत समझाती हूं। लेकिन यह मानता ही नहीं मुझे तो अब इसका एक ही रास्ता नजर आता है कि इसकी शादी कर दी जाये शायद जिम्मेदारी पड़ने से यह संभल जाये।

मुखिया: आपने जो करना है करो लेकिन हम अब ज्यादा नुकसान नहीं उठा सकते। गांव का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है। जिसे जुबान देकर यह पलटा न हो सब को ठग रहा है।

गांव वाले धमकी देकर चले जाते हैं। पल्टूराम घर अन्दर छिप कर सारी बातें सुन रहा था। उसकी मां अगले दिन ही पास के एक गांव में लड़की देख कर उसका रिश्ता पक्का कर देती हैं।

कुछ ही दिनों में पल्टूराम की शादी लाजवन्ती से हो जाती हैं। सब उसे लाजो कहकर बुलाते थे। वह बहुत ही होशियार थी।

शादी के बाद जब वह कुए पर पानी भरने जाती है तो गांव की औरते उसे पल्टूराम के बारे में सब बता देती हैं।

घर आकर वह पल्टूराम से बात करती है –

लाजो: मेरी तो किस्मत ही फूट गई तो तुम जैसा पल्टू मेरी किस्मत था। मैं तो अपने पीहर जा रही हूं।

यह सुनकर पल्टूराम बहुत परेशान हो जाता है। वह लाजो के पैर पकड़ लेता है।

पल्टूराम: नहीं नहीं मुझे छोड़ कर मत जाओ। मैं जानबूझ कर यह सब नहीं करता मेरी आदत ही ऐसी हो गई है। अपने आप जबान से झूठ निकलता है।

लाजो: ठीक है मैं सब ठीक कर दूंगी लेकिन तुम आज से बाहर किसी के सामने अपनी जबान नहीं खोलेगे। तुमने जबान खोली और मैं अपने पीहर गई।

पल्टूराम बात मान लेता है। पल्टूराम अगले दिन से अपने खेतों पर काम करने जाने लगता है। जब वह खेत पर पहुंचा तो सबको बहुत आश्चर्य हुआ।

किसान: क्यों बे पल्टू तू कैसे खेत पर आ गया तू तो कभी मेहनत करता नहीं था।

लेकिन पल्टू ने कोई जबाब नहीं दिया वह चुपचाप काम में लगा रहा। दोपहर को लाजो खाना लेकर आई पल्टू ने खाना खाया और फिर खेत पर काम करने लगा।

शाम तक वह बहुत थक गया था।

अगले दिन लाजो ने उसे घर का सामान लाने के लिये कहा –

पल्टू राम: मुझे गांव वाले सामान नहीं देंगे और फिर तुमने किसी के सामने बोलने को मना किया है।

लाजो: चलो मैं भी आपके साथ चलती हूं। आप बस सामान ले लेना दुकानदारों से बात मैं कर लूंगी।

लाजो एक दुकान पर पहुंची। पल्टूराम को देखते ही दुकानदार बोला –

दुकानदार: अरे तू फिर आ गया पिछली बार घर से पैसे भिजवा दूंगा बोल कर सामान ले गया और जब वहां मेरे लड़के ने पैसे मांगे तो अपनी बात से पलट गया। मैं तुझे सामान नहीं दे सकता।

लाजो: लालाजी सामान मैं लेने आई हूं। ये पकड़ो पिछले और अब के पैसे आगे से ये जो भी समान लेने आयें चुपचाप दे देना हम आगे से कभी उधार नहीं करेंगे।

दुकानदार ने उन्हें सामान दे दिया।

इसी तरह हर दिन लाजो जो भी सामान मंगाना होता। उसकी पर्जी बना कर पल्टूराम को देती और पैसे देती। पल्टू राम बिना कुछ बोले सामान ले आता था।

धीरे धीरे गांव के लोग पल्टूराम पर विश्वास करने लगे। उन्हें लगने लगा कि पल्टूराम सुधर गया है।

एक दिन कुछ गांव वाले चौपाल पर बैठे थे। पल्टूराम घर जा रहा था।

मुखिया: क्यों पल्टूराम तुम शादी होते ही सुधर गये तुम्हारी मां ठीक कहती थीं।

पल्टूराम बिना कुछ बोले जाने लगा तो गांव वालों ने उसे रोक लिया। अब पल्टूराम फस गया अगर वो बोला तो उसकी लाजो उसे छोड़ कर चली जायेगी। अगर नहीं बोला तो गांव वाले उसे जाने नहीं देंगे।

पल्टू राम मुखिया को इशारे से बताने लगा कि अगर वह बोला तो लाजो चली जायेगी। फिर उसने इशारे अपना गला पकड़ कर बताने की कोशिश की कि अगर लाजो चली गई तो वह फांसी लगा लेगा।

मुखिया ने समझा उसकी पत्नी ने फांसी लगा ली है। गांव के सभी लोग दौड़ते हुए मुखिया के घर पहुंचे। वहां उसकी पत्नी सही सलामत थी। वे सब पल्टूराम को मारने लगे।

इधर लाजो को किसी ने पल्टू राम की बात बता दी। वह भागते भागते मुखिया के घर पहुंची उसने पल्टूराम को छुड़ाया और सारी बात पूछी –

लाजो: तुम अपना मुंह खोल कर बता क्यों नहीं देते चुपचाप मार खा रहे थे।

पल्टूराम: तुमने ही तो मना किया था कि मैंने अपना मुंह खोला तो तुम पीहर चली जाओंगी। मैं मुखिया जी को यही बता रहा था कि अगर तुम चली गईं तो मैं फांसी लगा कर मर जाउंगा। इन्होंने समझा कि इनकी पत्नी फांसी लगा कर मर गई। यहां आकर ये सब मुझे मारने लगे लेकिन मैंने फिर अपना मुंह नहीं खोला। अब तो तुम मुझे छोड़ कर नहीं जाओंगी।

लाजो: मुखिया जी इन्हें मैं मौन रहने को कहा था। जिससे ये झूठ न बोले इतने दिनों में किसी गांव वाले का कोई नुकसान नहीं हुआ। फिर भी आपने इन्हें मारा।

मुखिया: बेटी हमें माफ कर दो हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। आज के बार कोई इसे पल्टूराम नहीं कहेगा। सब इसे गोविन्द के नाम से पुकारेंगे।

पल्टूराम और उसकी मां बहुत खुश थीं कि लाजो ने पल्टूराम के माथे से कलंक मिटा दिया।

फिर सब खुशी खुशी रहने लगे।

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