आशियाना भाग 2 | Emotional Love Story In Hindi

Emotional Love Story In Hindi

Emotional Love Story In Hindi : रचना और सचिन दोंनो एक दूसरे के प्यार में खोये घंटो बातें करते रहते थे। एक दिन प्रिया और रचना दोंनो अपने होस्टल के कमरे में सो रही थीं।

तभी रचना के मोबाईल की घंटी बजी दूसरी तरफ से रचना की मां शांति जी की घबराई आवाज सुनकर रचना डर गई – ‘‘बेटी तू जल्दी से घर आ जा तेरे पापा की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई है।’’

शांति जी ने इतना कहकर फोन काट दिया। रचना की आंखों से आंसू बह रहे थे। प्रिया भी फोन सुनकर उठ कर बैठ गई थी। रचना की ऐसी हालत देख कर वह फटाफट उठी और पानी की बोतल रचना के हाथ में दी। रचना ने दो घूंट पानी पिया।

‘‘क्या हुआ रचना तू रो क्यों रही है किसका फोन था?’’

‘‘प्रिया मेरे पापा बहुत बीमार हैं मुझे घर जाना पड़ेगा। मैं अभी ऑनलाईन टिकट देखती हूं शायद रात की किसी गाड़ी में रिजरवेशन मिल जाये।’’

यह कहकर रचना जल्दी जल्दी मोबाईल में टिकट ढूंढने लगी। तभी प्रिया बोली – ‘‘तू घबरा मत सब ठीक हो जायेगा ला में तेरी पैकिंग कर देती हूं।’’

प्रिया पैकिंग में लग गई। रचना को तत्काल में एक टिकट मिल गई दो घंटे बाद की ट्रेन थी। वो सुबह सात बजे तक कानपुर उतारने वाली थी।

रचना ने फटाफट सचिन को फोन मिलाया लेकिन उसका फोन स्विच ऑफ आ रहा था।

‘‘इसे भी आज ही फोन स्विच ऑफ करना था।’’

‘‘अरे तू छोड़ उसे मैं बता दूंगी। चल जल्दी से कैब बुक कर ले मैं कैन्टीन से कुछ खाने के लिये पैक करवा कर लाती हूं रात को खा लेना।’’

रचना ने प्रिया को गले लगा लिया – ‘‘थैंक्स यार तू नहीं होती तो पता नहीं क्या होता। मैं तो बहुत नर्वस हो रही हूं पता नहीं पापा को क्या हो गया। मां भी न कुछ ढंग से बताया भी नहीं।’’

‘‘अरे तू चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा। ज्यादा मत सोच और हां घर पहुंच कर मुझे फोन कर दियो। मैं सुबह सचिन को सब बता दूंगी। बस तू एक बात याद रखना ऐसे हालात में अपने घरवालों को सचिन के बारे में कुछ मत बताना।’’

‘‘हां ठीक है।’’

प्रिया जल्दी से केन्टीन की ओर चल दी वहां से उसने कुछ खाना पैक करवाया और रूम में आकर रचना के बैग में रख दिया। इसी बीच रचना हॉस्टल की वार्डन से परमीशन लेकर आ गई। दोंनो बैग और सूटकेस लेकर हॉस्टल के गेट पर आ गईं।

कुछ ही देर में कैब आ गई।

प्रिया से विदा लेकर रचना कैब से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गई। समय पर वह ट्रेन में चढ़ गई। रात भर उसे नींद नहीं आई घबराहट में उसे कभी पापा की याद आती कभी सचिन की।

रचना सचिन से बात करना चाह रही थी। लेकिन अब उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। किसी तरह रात कटी सुबह वह कानपुर पहुंच गई वहां से बस लेकर वह अपने गांव पहुंच गई।

घर पहुंचते ही रचना ने देखा उसके पापा बिस्तर पर लेटे हुए हैं और मां उनके पैरों के पास बैठी थी। घर में एक दो पड़ोस की औरते और आदमी भी बैठे थे।

रचना ने मम्मी के कंधे पर हाथ रखा। शांति जी ने रचना को देखा। उन्होंने उसे चुप रहने के लिये कहा और उसे बाहर चलने के लिये इशारा किया।

बाहर आकर शांति जी ने रचना को गले से लगा लिया। रचना ने अपनी मम्मी को कस के जकड़ लिया। जब दोंनो अलग हुईं तो उसने देखा क्या ये ही उसकी मम्मी थीं। हमेशा उत्साह से भरी रहने वाली। आज उनका चेहरा बिल्कुल मुरझाया हुआ था।

आंखें नम थीं। आंखों के नीचे गहरे काले गढ्ढे थे। ऐसा लगता है पता नहीं कितनी रातों से सोई नहीं हैं। बहुत कमजोर लग रहीं थी। रचना को लगा जैसे उसके पापा नहीं उसकी मम्मी बीमार हैं।

रचना अपने आप को रोक नहीं पाई वह रोने लगी। शांति जी की आंखों में आंसू थे वे अपने हाथों से रचना के आंसू पौंछ रहीं थी।

‘‘बेटी तू चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा।’’

कुछ देर में रचना सामान्य हुई तो उसने शांति जी से पूछा – ‘‘मम्मी आपने फोन पर कुछ बताया नहीं अचानक पापा को क्या हो गया?’’

‘‘बेटा तेरे पापा स्कूल गये थे। वहीं बेहोश हो गये स्कूल वाले इन्हें हॉस्पिटल ले गये। वहां पता लगा इन्हें हार्ट अटैक आया है। उस समय तो उन्होंने इंजेक्शन और दवाईयां देकर इन्हें बचा लिया लेकिन तुरन्त कानपुर रेफर कर दिया।

हम इन्हें कानपुर ले गये वहां पता लगा कि इनके हार्ट में ब्लोकेज है। वहां स्टंट डाली गई। इस सब के बीच मैं इतना घबरा गई थी, कि तुझे फोन करने का ध्यान ही नहीं रहा।’’

रचना यह सुनकर आश्चर्य से बोली – ‘‘ये क्या कह रही हो मम्मी ये सब कब हुआ था? पापा घर कब आये।’’

‘‘बेटी इस बात को एक सप्ताह हो गया। मैं कल ही तेरे पापा को छुट्टी मिली है। मैं अपना फोन घर पर ही भूल गई थी। घर मैं आ नहीं पाई कल हम आये तब मैंने तुझे फोन किया।’’

रचना को अपनी मम्मी पर बहुत गुस्सा आ रहा था। वह कमरे में जाने लगी तो उसकी मम्मी ने कहा – ‘‘बेटा अभी तेरे पापा दवा खाकर सोये हैं तीन चार घंटे बाद उठेंगे। डॉक्टर ने कहा है वे जितना आराम करेंगे उतनी जल्दी ठीक हो जायेंगे। तुझे देखेंगे तो घबरा जायेंगे। कल भी मना कर रहे थे। कह रहे थे रचना को क्यों परेशान कर रही है। मैं ठीक तो हूं।’’

रचना वहीं खड़ी रह गई। अभी उसे मम्मी पर गुस्सा आ रहा था लेकिन फिर उसने सोचा कि मम्मी ये सब अकेले झेला है। कितनी हिम्मत दिखाई मम्मी ने यह सोच कर वह शांति से से लिपट गई।

‘‘बेटा चिंता मत कर सफर से आई है तू हाथ पैर धो ले मैं चाय बना कर लाती हूं फिर तू आराम से सो जा जब तक तू उठेगी तेरे पापा भी जग जायेंगे।’’

रचना वहीं पास में पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गई। कमरे में बैठे लोग अपने अपने घर चले गये। उनके जाने के बाद रचना पापा के सिरहाने बैठ कर उन्हें निहारने लगी।

कुछ देर में शांति जी चाय बना लाई साथ में कुछ बिस्कुट भी थे। रचना के सिर में दर्द हो रहा था। चाय के साथ बिस्कुट खाकर उसे बहुत राहत मिली वह रात से भूखी भी थी।

शांति जी भी अपना चाय का कप लेकर उसके पास आकर बैठ गईं।

‘‘मम्मी आप अपना भी ध्यान रखो। कितनी कमजोर लग रही हों।’’

‘‘क्या करूं बेटी कुछ खाने का मन ही नहीं करता। हॉस्पिटल में भी आस पड़ोस के लोग खाना पहुंचा आते थे। लेकिन मेरे से खाया नहीं जाता था। अब घर में अकेले कुछ बनाने का मन नहीं करता। बस तेरे पापा के लिये खिचड़ी या दलिया बगैरा बनाती हूं वही बचा हुआ खा लेती हूं।’’

रचना को अपनी मम्मी पर बहुत तरस आ रहा था – ‘‘अब तुम चिंता मत करो मैं आ गई हूं। खाना मैं बना लूंगी।’’

शांति जी के चेहरे एक फीकी सी मुस्कुराहट आई और चली गई।

कुछ देर बाद रचना दूसरे कमरे में सोने चली गई।

रचना के जाने के बाद जब अगले दिन प्रिया कॉलेज पहुंची तो सचिन ने उसे रोक कर रचना के बारे में पूछा – ‘‘प्रिया, रचना कहां है और उसका फोन क्यों स्विच ऑफ आ रहा है।?’’

प्रिया ने उसे सारी बात बता दी

‘‘ओहो कल मेरे फोन की बैटरी खत्म हो गई थी। प्लीज अगर रचना से बात हो तो मुझे बता देना।’’

सचिन बहुत परेशान हो गया। शाम को उसने रचना को फिर से फोन मिलाया – ‘‘रचना कैसी हो तुम और तुम्हारे पापा कैसे हैं मुझे तो बहुत चिंता हो रही थी। तुम्हारा फोन भी स्विच ऑफ था। मैं वहां आ जाउ क्या?’’

एक ही सांस में सचिन ने सारे सवाल पूछ डाले।

‘‘सचिन मैं बिल्कुल ठीक हूं। तुम चिंता मत करो। पापा को हार्ट अटैक आया था। अब ठीक हैं और तुम यहां मत आना यह गांव देहात है मैं किसी को तुम्हारे बारे में क्या बताउंगी।’’

‘‘लेकिन रचना तुम वापस कब आओगी? मुझे तुम्हारी बहुत चिंता हो रही है।’’

‘‘सचिन अभी तो मैं नहीं आ सकती, क्योंकि मम्मी पापा की देखभाल कर रही हैं ऐसे में उनकी हालत भी ठीक नहीं है। न ढंग से खाती हैं न पीती हैं। मुझे पापा के साथ साथ उनका भी ख्याल रखना होगा।’’

‘‘लेकिन तुम्हारी पढ़ाई का क्या होगा?’’

रचना को कुछ समझ नहीं आ रहा था, उसने कहा  – ‘‘सचिन अभी कुछ कह नहीं सकती बाद में देखा जायेगा।’’

यह कहकर रचना ने फोन काट दिया क्योंकि उसकी मम्मी बुला रही थी।

दीनानाथ जी जग चुके थे। रचना को देख कर वे बहुत खुश थे – ‘‘शांति तुमने बेकार इसे परेशान किया अब तो सब ठीक हो गया था।’’

रचना अपने पापा के गले लग गई – ‘‘पापा आपको इस हाल में देख कर मुझे कितनी तकलीफ हुई है। मम्मी को पहले ही मुझे खबर करनी चाहिये थी, सब कुछ अकेले ही संभालती रहीं।’’

तभी शांति जी कमरे में आई – ‘‘अच्छा आते ही पापा से मम्मी की शिकायत शुरू कर दी।’’

यह सुनकर दोंनो हस पड़े उन्हें देख कर शांति जी भी हस पड़ी।

‘‘देखा मेरी बेटी के आने से तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान तो आई वरना सारे दिन उदास बैठी रहती थीं। अब मैं जल्दी अच्छा हो जाउंगा।’’ दीनानाथ जी ने शांति जी की ओर देखते हुए कहा।

प्रिया हर दिन रचना को फोन करके उसका और उसके पापा का हालचाल पूछती थी। एक दिन प्रिया ने बताया कि सचिन कई दिन से कॉलेज नहीं आ रहा जब प्रिया ने फोन किया तो बोला – ‘‘रचना के बगैर मन नहीं लग रहा इसलिये वह अब तभी कॉलेज आयेगा जब रचना आ जायेगी।’’

उसकी बात सुनकर रचना कुछ परेशान हो गई उसने तुरंत फोन काट कर सचिन को फोन मिलाया – ‘‘सचिन मैं ये क्या सुन रही हूं तुम कॉलेज नहीं जा रहे हो। मेरे कारण तुम्हारी पढ़ाई का नुकसान हो ये मुझसे बर्दास्त नहीं होगा। तुम कल से कॉलेज जाओ मुझे तो आने में अभी टाईम लगेगा। तुम नोट बना कर रखना मैं तुमसे ले लूंगी।’’

‘‘नहीं रचना मुझे तुम्हारी याद आती है कॉलेज में अच्छा नहीं लगता मैं नहीं जा रहा कॉलेज। बस एक बार मुझे अपने गांव आने दो तुम्हें देखे बगैर मेरा मन उदास रहता है।’’

रचना ने हसते हुए कहा – ‘‘अरे साहब मैं कहां भागी जा रही हूं। देवदास मत बनो कॉलेज जाओ। पढ़ाई करो। नहीं तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगी।

‘‘अच्छा ठीक है कल से चला जाउंगा। लेकिन तुम्हें मुझसे रोज बात करनी पड़ेगी।’’

‘‘हां ठीक है। चलो अब मैं कल बात करूंगी। अभी मम्मी बुला रही हैं।’’

सचिन अगले दिन कॉलेज गया। उसने किसी तरह कॉलेज में कुछ लैक्चर अटेंड किये और फिर घर आ गया।

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