राजेश: संजना तुम तैयार नहीं हुईं?
संजना: बस दो मिनट दीजिये अभी चलते हैं। आप भी न कितना परेशान हो जाते हो।
राजेश: वो बात नहीं है संजना मम्मी को बुरा लग जायेगा। मैं ऑफिस से आने में वैसे ही लेट हो गया।
संजना: ओफ्फो आप भी न बस एक ही बात करते रहते हो। अगर सलीके से नहीं गई तो मम्मी जी वैसे ही गुस्सा हो जायेंगी। सुननी तो मुझे पड़ेंगी।
राजेश: ठीक है जल्दी चलो।
दोंनो जल्दी से गाड़ी में बैठ कर घर पहुंच जाते हैं। पिंक साड़ी में संजना बहुत सुन्दर लग रही थी। घर पहुंचते ही राजेश घंटी बजाता है।
सरला जी दरवाजा खोलती हैं। बेटे को सामने देख कर उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। राजेश उनके पैर छूता है।
राजेश: क्या मम्मी आप फिर से इमोशनल हो रही हों? पापा कहां हैं?
सरला जी: बेटा अभी आ रहे हैं बाजार से कुछ सामान लेने गये हैं। लो आ गये।
पीछे खड़े मधुसूदन जी को देख कर सरला जी ने कहा। राजेश ने मुड़ कर उनके पैर छुए।
राजेश: कैसे हैं पापा?
मधुसूदन जी: बेटा मैं बिल्कुल ठीक हूं। तुम दोंनो कैसे हो?
पीछे खड़ी संजना यह सब देख रही थी। उसके बाद उसने मम्मी पापा के पैर छुए पापा ने अपनी बहु को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। लेकिन सरला जी से उसे कोई आशीर्वाद नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद भी नहीं थी।
सरला जी को लगता था। राजेश को बहला फसला कर गुरुग्राम ले गई नौकरी के बहाने मम्मी पापा से इकलौते बेटे को अलग करने के लिये वे संजना को दोषी मानती थीं।
मधुसूदन जी: अरे बेटा बैठो! खड़े क्यों हो?
सभी ड्राईंग रूम में बैठ जाते हैं।
संजना फटाफट किचन में जाकर पानी ले आती है। सभी पानी पीते हैं।
मधुसूदन जी: बेटा जॉब कैसी चल रही है।
राजेश: बढ़िया पापा सब मजे से चल रहा है।
सरला जी: क्या मजे से चल रहा है। देख आंखों के नीचे काले गढ्ढे पड़ गये हैं। यहां पास में नोकरी करता था। वहां तेरा ध्यान रखने वाला कौन है?
इशारा संजना की तरफ था क्योंकि वह भी तो जॉब करती थी।
राजेश: अरे यार मम्मी फिर वही बात लेकर बैठ गईं। आपको कितनी बार कहा है कि वहां मैं अपनी जॉब के कारण गया हूं और फिर आपसे हर वीक एण्ड पर मिलने आता तो हूँ।
सरला जी: ठीक है मैं कुछ नहीं कहूंगी लेकिन अपना ध्यान तो रखा कर।
राजेश: मम्मी ध्यान रखते हैं हम दोंनो ने जिम ज्वाईन किया है। वहां एर्क्ससाईज करने के कारण आपको ऐसा दिख रहा है।
मधुसूदन जी: अरे बच्चे आये हैं इन्हें कुछ खिलाओंगी पिलाओंगी या सिर्फ ताने ही मारती रहोंगी।
सरला जी उठ कर किचन में जाने लगती हैं। संजना उनके पीछे पीछे जाती है।
संजना: लाईये मम्मी जी मैं परोस देती हूँ। आप बैठ जाईये।
सरला: अभी इतनी बूढ़ी नहीं हुई हूँ। तुम बैठो तुम तो मेहमान बन कर आई हों मैं लाती हूँ।
संजना वापस आ जाती है वह एक नजर राजेश की तरफ देखती है। राजेश उसे शांत रहने का इशारा करता है।
सरला जी कुछ देर में प्लेट में नाश्ता लगा कर ले आती हैं।
सरला जी: चाय पियोगे या कुछ ठंडा?
राजेश: मम्मी आप बैठो चाय संजना बना लायेगी। आप मेरे पास बैठो आपसे ढेर सारी बातें करनी हैं।
सरला जी आकर अपने बेटे के पास बैठ जाती हैं।
राजेश: मम्मी तुम हर समय संजना को बुरा भला कहती रहती हों। जानती हो उसे बड़ी मुश्किल से एक छुट्टी मिलती है उसमें वह जल्दी जल्दी घर के काम निबटा कर आप लोगों से मिलने आती है।
सरला जी: अरे दो लोगों का काम ही कितना होता है? सप्ताह में एक दिन अपने बूढ़े मॉं बाप से मिल कर ऐहसान कर रहे हो। मत आया करो मिलने।
मधुसूदन जी: जब बच्चे मिलने नहीं आते तो रोती रहती हो। अब मिलने आये हैं तो ढंग से बात करने के बजाये लड़ रहीं हो।
तभी संजना चाय लेकर आ जाती है। उसे देख कर सभी चुप हो जाते हैं।
शेष आगे …















