रिश्तों की डोर – भाग 7

Rishron ki Dor Bhag 7

शालिनी ने रास्ते में किसी से कोई बात नहीं की।

घर में आते ही शालिनी ने अपनी माँ से पूछा –

शालिनी: माँ इतनी बड़ी बात आपने मुझसे क्यों नहीं बताई और आपने सागर को भी उल्टा सीधा सुना कर भगा दिया। यहां तक कि तेरहवीं का कार्ड फाड़ कर उसके मुंह पर मार दिया।

सुशीला जी ने हिम्मतलाल जी की ओर गुस्से से देखा।

शालिनी: माँ पापा को कुछ मत कहना। आपको पता है आज शादी में सागर आया था और मुझे इग्नोर करके चला गया। आखिर मैं पूछती हूँ। आपके अंदर की सारी इंसानियत मर गई क्या?

सुशीला जी: मैंने जो कुछ भी किया तेरी भलाई के लिये मैं नहीं चाहती थी कि वो तेरे रास्ते का कांटा बने।

शालिनी: कौन सा रास्ता माँ, वो रास्ता जिस पर चलना मुझे सागर ने सिखाया है। आज इस घर में जो कुछ भी है वो सागर की वजह से है और उस पर जरा सा बुरा वक्त आया तो हमने अपनी औकात दिखा दी।

मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, जो मैंने तुम्हारी बात मान कर उससे शादी के लिये कहा। आपको पता है आज मैं अपने आप को कितना छोटा महसूस कर रही हूँ। आपको अच्छे से पता है कि कभी भी सागर मेरे पीछे नहीं आया था, मैं सागर के पीछे पड़ी थी।

हिम्मतलाल जी: बेटी अब जो होना था हो गया। अब आगे की सोच क्या करना है।

शालिनी: अब आगे क्या बचा है पापा। मैंने सागर को हमेशा के लिये खो दिया।

यह कहकर वह फूट फूट कर रोने लगी। रोते रोते वह अपने कमरे में गई और गेट बंद करके पलंग पर पड़ गई।

शालिनी को आज लग रहा था, जैसे उसकी दुनिया खत्म हो गई।

इधर सागर जब शालिनी के घर से बेज्जत होकर वापस आया तो उसने किसी से बात नहीं की घर मेहमानों से भरा हुआ था।

वह चुपचाप अपने कमरे में चला गया। कुछ देर बाद पुष्पा जी उसके कमरे में गईं।

पुष्पा जी: क्या हुआ बेटा बहुत परेशान है?

सागर: नहीं माँ कुछ भी नहीं। आप टेंशन न लो मैं सब संभाल लूंगा।

तेरहवी के अगले दिन सारे मेहमान विदा हो गये।

पुष्पा जी: बेटा शालिनी बिट्यिा नहीं आई तेरहवी पर और न एक बार मिलने आई।

सागर: माँ उसे ऑफिस के जरूरी काम से अमेरिका जाना पड़ा वो यहां होती तो जरूर आती।

पुष्पा जी: क्या तूने तो बताया नहीं? ऐसे कैसे चली गई? उसके मम्मी पापा भी नहीं आये?

सागर: माँ आप परेशान न हों, जब वो ही नहीं है तो उसके मम्मी पापा आकर क्या करते।

पुष्पा जी समझ गईं थीं कि जरूर कोई बात है, अब वो सागर का बहुत ध्यान रखने लगीं थीं। क्योंकि उन्हें पता था कि सागर एक पल भी शालिनी के बगैर नहीं रह सकता था। आज अचानक दोंनो अलग हो गये।

एक सप्ताह बाद सागर घर आया और माँ से बोला –

सागर: माँ मैंने एक कंपनी में अप्लाई किया था, वहां मेरा सलेक्शन हो गया। सैलरी भी बहुत ज्यादा ऑफर हुई है। हमें बंगलौर जाना है।

पुष्पा जी: बेटा यहां सब छोड़ कर?

सागर: माँ अब यहां बचा क्या है। पापा थे तो रौनक रहती थी। इस घर में पापा की बहुत याद आती है। सब कुछ खत्म हो गया अब मुझे केवल तुम्हारा ध्यान रखना है। चलो न मॉं! वहां नये सिरे से जिंदगी शुरू करते हैं।

पुष्पा जी: बेटा एक बार शालिनी से बात कर ले।

सागर: माँ हमारे बीच सब खत्म हो चुका है। मैंने तुम्हें उस समय कुछ बताया नहीं हमारे ब्रेकअप के बाद ही वह अमेरिका गई है।

यह सुनकर पुष्पा की आंखों से आंसू बहने लगे।

पुष्पा जी: बेटा इतना दर्द सहन करके भी तेरे चेहरे पर शिकन नहीं है, कि कहीं तेरी माँ न परेशान हो जाये। एक तरफ पापा दूसरी तरफ शालिनी दोंनों को खोने से तू कितना टूट गया होगा ये मैं समझ सकती हूँ।

पापा को तो वापस नहीं ला सकती हूँ, लेकिन शालिनी से तो बात कर सकती हूँ। तू एक बार मेरी उससे बात करा दे।

सागर: माँ ऐसा नहीं हो सकता। उसके और मेरे रास्ते अलग अलग हैं। आप मेरा भला चाहती हों तो मेरे साथ चलो। वरना मैं यहां घुट घुट कर जीता रहूंगा।

पुष्पा: चल बेटा जहां चाहें ले चल अपनी मॉं को मैं तो हर हाल में तेरी खुशी चाहती हूँ। लेकिन भगवान उस लड़की को कभी माफ नहीं करेगा, जो ऐसे कठिन समय में मेरे बेटे का साथ छोड़ गई।

सागर: माँ ऐसा मत कहो। शायद उसकी कोई मजबूरी रही होगी।

पुष्पा: ये तेरी इंसानियत है बेटा। तू चिन्ता मत कर इससे अच्छी लड़की मिलेगी तुझे।

एक सप्ताह बाद दोंनो बंगलौर पहुंच जाते हैं। सागर ऑफिस ज्वाईन कर लेता है और मन लगा कर काम करने लगता है।

एक दिन काव्या का फोन आया तो उसे पिछली सारी बातें याद आ गईं।

सागर: काव्या मेरी ओर से तुम्हें शादी की ढेर सारी बधांईयां, लेकिन मैं आ नहीं पाउंगा।

काव्या: यार तुझे मेरी कसम आना तो पड़ेगा।

सागर: ठीक है तू बहुत जिद्दी है। लेकिन मेरी एक शर्त है। मेरे आने के बारे में किसी को कुछ मत बताना। तू जानती है मैं किसकी बात कर रहा हूँ, और मैं ज्यादा रुक नहीं पाउंगा।

काव्या: तू बस आजा मैं किसी से तेरे बारे में जिक्र नहीं करूंगी।

शेष अगले भाग में …

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रिश्तों की डोर – भाग 3रिश्तों की डोर – भाग 4
रिश्तों की डोर – भाग 5रिश्तों की डोर – भाग 6
रिश्तों की डोर – भाग 7रिश्तों की डोर – भाग 8
रिश्तों की डोर – भाग 9रिश्तों की डोर – भाग 10
Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.