कहते हैं कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, इसी तर्ज पर चलने की कोशिश आज रजत को मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे से मुंबई ले आई। एक दोस्त के कहने पर वह अपनी ग्रेजुऐशन पूरी करके मुंबई पहुंच गया। उसके दोस्त अमर ने उसका साथ भी दिया। उसने उसे एक जगह काम पर भी लगा दिया। दिन भर काम करके दोंनो दोस्त शाम को एक छोटी सी खोली में बैठ कर अपने बचपन के दिन याद करते थे।
कुछ दिन इसी तरह बीत गये। एक दिन रतज जब लोकल ट्रेन से मलाड अपने घर जा रहा था उसे एक लड़की मिली वह ट्रेन में बहुत मुश्किल से खड़ी हो पा रही थी। रजत ने उसे कई बार देखा वह कभी एक पैर उपर उठाती कभी अपने पैर को हल्के से फर्श पर रखती जैसे ही पैर फर्श पर रखती दर्द की लकीरें उसके चेहरे पर उभर आती। अनजान शहर में अमर ने उसे किसी से भी बात करने के लिये मना किया था, लेकिन रजत से रहा नहीं गया उसने उस लड़की से कहा – ‘‘आप मेरी सीट पर बैठ जाईये।’’ लड़की ने आचर्श्य से रजत की ओर देखा और चुपचाप वह सीट पर जाकर बैठ गई।
कुछ देर बाद लड़की का स्टेशन आ गया वह बोली – ‘‘आप बैठ जाईये मुझे उतरना है। रजत ने कहा -‘‘नहीं बस अगला स्टेशन मेरा ही है।’’ लड़की अपनी सीट से उठी और रजत के पास आाकर बोली – ‘‘लगता है आप मुंबई से नहीं हैं।’’
रजत ने मुस्कुरा कर कहा – ‘‘जी मैं मध्य प्रदेश से हूं। लेकिन आपको कैसे पता।’’ लड़की हसते हुए बोली – ‘‘यह मुंबई है। यहां कोई किसी को अपनी सीट नहीं देता चाहें जान चली जाये।’’
तभी उसका स्टेशन आ गया वह उतर कर चली गई जाते समय उसने एक बार मुस्कुरा कर रजत को देखा। पता नहीं क्यों आज उसे अंदर से बहुत खुशी हुई। कुछ ही सेकेंड में वह लड़की भीड़ में कहीं खो गई।
रजत घर आया उसने सारी बात अमर को बताई, यह सुनकर अमर हसते हुए बोला – ‘‘ओ भाई जरा संभल के ये मुंबई है। यहां की लड़की कब हस हस कर तुझे बेच देगी पता भी नहीं चलेगा।’’
यह सुनकर रजत हसने लगता है – ‘‘अबे अब वो मुझे कहां मिलेगी। परेशान थी बस मदद कर दी पर उसने स्माईल के साथ जो पलट कर देखा वो मेरे दिल में उतर गया।’’
रजत की बात सुनकर अमर बोला – ‘‘चल खाना खाते हैं। रात में सपने में उसे बुला कर एड्रस ले लेना।’’ इसी तरह बात करते करते दोंनो सोने चले गये। अगले दिन रजत अपने काम पर गया। इसी तरह कुछ दिन बीत गये।
एक दिन रजत जब वापस घर आ रहा था। ट्रेन में आज कम भीड़ थी सभी अपनी सीट पर बैठे थे एक दो लोग ही खड़े थे वो भी शायद उतरने के लिये खड़े थे। रजत अपने ख्यालों में खोया था तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। रजत ने पलट कर देखा तो सामने वही लड़की थी। इससे पहले कि रजत कुछ कहता लड़की बोली – ‘‘पहचाना आपने’’ रजत ने हां में सिर हिलाया।
‘‘मेरा नाम पायल है मैं यहीं दादर में नौकरी करती हूं और इसी ट्रेन से अप डाउन करती हूं’’ रजत उसे देखे जा रहा था जैसे वह कहीं खो गया। फिर उसने अचानक चौंकते हुए कहा – ‘‘अच्छा जी मैं भी दादर से थोड़ी दूर एक ऑफिस में काम करता हूं और अक्सर इसी ट्रेन से आता जाता हूं कभी कभी लेट भी हो जाता हूं।’’
कुछ देर दोनों ऐसे ही एक दूसरे के बारे में बात करते रहे। अब यह उनका हर दिन का रूटीन हो गया था दोंनो इसी ट्रेन में मिलते थे। एक दिन रजत शाम को ऑफिस से निकल रहा था तभी उसके मैंनेजर ने कहा – ‘‘रजत तुम्हें काफी दिनों से नोटिस कर रहा हूं तुम बिल्कुल टाईम पर निकल जाते हो पहले कभी कभी रुक कर काम निबटा कर जाते थे।’’
रजत बोला – ‘‘सर मैं सुबह जल्दी आकर सारा काम निबटा देता हूं आप चाहें तो गार्ड से पूछ लीजिये लेकिन मुझे कुछ काम रहता है इसलिये मैं शाम को नहीं रुक सकता।’’ मैंनेजर ने उससे कुछ नहीं कहा क्योंकि वह बहुत मेहनती था और काम समय पर पूरा करता था।
रजत ऑफिस से निकल कर जल्दी जल्दी स्टेशन की ओर चलने लगा। वह मन ही मन मुस्कुरा रहा था। जरूरी काम पायल से मिलना जो था।
पायल के घर में उसकी मां थी। जो अक्सर बीमार रहती थी। पायल की कमाई से ही घर का खर्च चलता था। इधर रजत भी अपने घर से पैसे कमाने के मुंबई आया था। छोटे से कस्बे में रहने वाला रजत मुंबई की चमक दमक देख कर सब भूल गया कि गांव में उसके पापा पर काफी कर्ज था। मकान भी गिरवीं पड़ा था। एक बहन थी जिसकी शादी करनी थी। पापा खेती करते थे। मौसम की मार से कभी फसल बच जाये तो घर का खर्च चल जाता था।
रजत को अब न तो घर की चिंता था। उसे बस पायल की चिंता थी। वह उससे बहुत प्यार करने लगा था। उसके साथ समय बिताना रजत को अच्छा लगता था।
अगले भाग में जानेंगे कि क्या रजत और पायल का प्यार सफल हो पाया?
क्या रजत अपने परिवार को कभी कर्ज से निकाल पाया या वह सिर्फ पायल के हाथ की कठपुतली बन कर रह गया?
क्या पायल रजत के साथ खुश रह पायी या उसके सपने कुछ और थे?


















Leave a Reply
View Comments