Princess Story for Kids : राजा महेन्द्रसिंह की पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था। उनकी एक बेटी थी। जिसे राजा अपनी जान से ज्यादा चाहते थे।
जब राजकुमारी दस वर्ष की हुई तो राजा महेन्द्रसिंह ने उसकी शिक्षा के लिये राजमहल के पास ही एक गुरुकुल बनवा दिया। जिससे राजकुमारी को कहीं बाहर न जाना पड़े।
राजकुमारी प्रिया बहुत लाड़ प्यार से पढ़ी थी। उसे बाहर की दुनिया की कोई खबर नहीं थी। वह पहले दिन गुरुकुल में पढ़ने गई। राजा महेन्द्रसिंह उसे खुद गुरु जी के पास लेकर गये। उन्होंने गुरु जी से आशीर्वाद देने के लिये कहा –
राजा: बेटी ये हमारे कुलगुरु हैं इन्हें प्रणाम करके आशीर्वाद लो।
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राजकुमारी: लेकिन पिताजी आपने तो कहा था राजा किसी के आगे नहीं झुकते फिर मैं आपकी बेटी होकर कैसे झुक सकती हूं।
गुरु जी: राजन् बेटी को विवश न करें जब इसके मन में ज्ञान का दीपक जलेगा तो यह स्वयं झुकना सीख जायेगी।
राजा दुःखी मन से वापस आ गये। आज अगर रानी जिन्दा होती तो वे राजकुमारी को अच्छे संस्कार दे पाती।
राजकुमारी ने अगले दिन से गुरुकुल जाना शुरू कर दिया। वह सुबह अपनी दो सखियों के साथ गुरुकुल जाती थी।
एक दिन गुरुजी ने राजकुमारी से कहा –
गुरुजी: राजकुमारी तुम्हें आज से सभी शास्त्र पढ़ाये जायेंगे।
जब गुरुजी उन्हें शास्त्र की शिक्षा दे रहे थे तो राजकुमारी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह उठ कर खड़ी हो गई।
राजकुमारी: गुरुजी मैं एक राजा की बेटी हूं मुझे शिक्षा की क्या आवश्यकता जब भी जरूरत होगी कोई न कोई मेरा काम कर देगा। इतनी कठिन शिक्षा मुझसे पूरी न हो पायेगी, मुझे क्षमा करें।
गुरुजी: बेटी शिक्षा का बड़े या छोटे से कोई मतलब नहीं है। जब तक तुम स्वयं मुझे शिक्षा के लिये नहीं कहोंगी मैं तुम्हें ज्ञान नहीं दूंगा।
राजकुमारी बहुत खुश हो गई।
एक दिन गुरुजी अपने गुरुकुल के सभी शिष्यों को लेकर एक पहाड़ के पास गये।
गुरुजी ने सभी शिष्यों से कहा –
गुरुजी: यह एक छोटा सा पहाड़ है। इस पर सभी को चढ़ना है जो सबसे पहले उपर पहुंच जायेगा। उसे पुरुस्कार मिलेगा।
सभी उस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगे। राजकुमारी ने भी कोशिश की लेकिन उसने जैसे ही पहाड़ पर चढ़ना शुरू किया वह चढ़ ही नहीं पाई और फिसल कर नीचे आ गई।
फिर उसने अपनी दोंनो दासियों के साथ चढ़ने की कोशिश की लेकिन जब तीनों एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चढ़ रहीं थीं तो राजकुमारी के कोमल हाथ से दासी का हाथ छूट जाता है और तीनों फिसल कर नीचे आ जाती हैं।
तभी राजकुमारी देखती है कि गुरुकुल का सबसे छोटा बालक पहाड़ की चोटी तक पहुंच गया।
कुछ देर बाद सभी नीचे आ गये। गुरुकुल आने के बाद गुरुजी ने उस छोटे से बालक को इनाम के तौर पर एक पुस्तक भेंट की जिसे पाकर वह बहुत खुश हुआ और सब काम छोड़ कर उसे पढ़ने के लिये बैठ गया।
राजकुमारी और उसकी दोंनो दासियां मिट्टी में लिपटी हुई खड़ीं थीं। उन्हें देख कर गुरुजी ने पूछा –
गुरुजी: राजकुमारी तुम चाहती तो यह प्रतियोगिता जीत सकती थीं। तुम्हारा काम तो कोई भी कर सकता है। फिर तुम क्यों हार गईं।
यह सुनकर राजकुमारी रोने लगी।
गुरुजी: तुम्हें चढ़ना नहीं आता था। इसलिये गिरी। दूसरी बार तुमने कष्ट नहीं उठाये इसलिये तुम्हारे हाथ इतने कोमल हैं कि वे दासियों के हाथ से फिसल गये। इसलिये तुम गिर गईं।
आज अगर कोई दुश्मन हम पर हमला कर दे, तो मेरे सभी शिष्य भाग कर पहाड़ पर चढ़ जायेंगे और वहां से पत्थर मार मार कर उसे घायल कर देंगे।
लेकिन तुम पकड़ी जाओंगी। क्योंकि तुमने तो चढ़ना सीखा ही नहीं।
यह सुनकर राजकुमारी रोती हुई गुरुजी के चरणों में गिर गई।
राजकुमारी: गुरुजी क्या आप मुझे शिक्षा देंगे। मैं शिक्षा ग्रहण करना चाहती हूं।
अगले दिन से राजकुमारी मन लगा कर सभी कलाओं को सीखने लगी। कुछ ही दिन में वह शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर विद्वान बन गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना, घुड़सवारी करना, युद्ध कौशल, अच्छे संस्कार, मान-सम्मान करना। यह सब सीख गई थी।
जब उसकी शिक्षा पूर्ण हुई तो राजा महेन्द्रसिंह बहुत खुश हुए।
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