तुलसी मैया ही मेरी माँ : एक गॉव में पृथ्वीसिंह नाम के एक जमींदार थे। पृथ्वीसिंह काफी पैसे वाले थे। उनकी दो बेट्यिां रचना और पुष्पा थीं। पुष्पा के जन्म के समय उनकी पत्नि का स्वर्गवास हो चुका था। इसलिए वे पुष्पा को ज्यादा प्यार नहीं करते थे।
रचना को वे बहुत प्यार करते थे। रचना को भी इस बात का बहुत घमंड था। वह भी अपनी बहन पुष्पा से नफरत करती थी। रचना के लिए बढ़िया से बढ़िया पकवान बनाये जाते थे। पुष्पा को उसका बचा हुआ भोजन मिलता कभी वह भी नहीं बचता तो वह भूखी ही सो जाती थी।
धीरे धीरे समय बीता और दोंनो बेट्यिां बड़ी हो गई। पुष्पा सुबह जल्दी उठ कर स्नान आदि करके घर के आंगन में लगी तुलसी की बड़े मन से पूजा करती उसके बाद मन्दिर जाती वहां से आने के बाद सारे घर का काम करती।
रचना देर से उठती और वह स्नान आदि करके घूमने चली जाती थी। एक दिन पुष्पा ने रचना से कहा
‘‘बहन हमारी मॉं नहीं है। मैंने तो तुलसी मॉं को ही अपनी मॉं मान लिया है। जब में सुबह इनकी पूजा करती हूं तो मुझे इनमें मॉं की छवि दिखाई देती है। तुम भी सुबह मॉं तुलसी की पूजा किया करो और मेरे साथ मन्दिर चला करो।’’
रचना ने कहा ‘‘मैं किसी पेड़ को अपनी मॉं नहीं मान सकती तुझे जो करना है वो कर मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है जो मैं पूजा पाठ करूं’’ यह कह कर वह घूमने चली गई।
कुछ दिन बाद पृथ्वि सिंह ने एक बहुत अमीर खानदान में लड़का देख कर रचना का विवाह तय कर दिया। रचना बहुत खुश थी।
उसने पुष्पा से कहा ‘‘देखा मेरा विवाह भी अच्छी जगह हो रहा है अब मैं पूरी जिन्दगी मजे करूंगी बिना पूजा पाठ किये मुझे सब मिल गया’’
पुष्पा ने कहा ‘‘बहन तुम मानों या न मानों यह सब तुलसी मैया की कृपा है जिस घर के आंगन में तुलसी मैया का पौधा होता है। और उनकी पूजा होती है उस घर में कभी कुछ अशुभ नहीं हो सकता’’
रचना ने कहा ‘‘ये सब किस्मत से मिलता है। तूने बचपन से आज तक तुलसी की पूजा की पर तुझे हमेशा पुराने कपड़े और झूठन ही खाने को मिली मुझेे बिना कुछ किये सारे सुख मिले’’
पुष्पा ने कहा ‘‘बहन इतना घमंड करना ठीक नहीं है अब तुम इस घर से विदा होने वाली हो एक बार तुलसी मैया का आशीर्वाद लेकर ही अपनी ससुराल जाना वहां भी तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा’’
तभी पीछे से पृथ्वी सिंह की आवाज आई ‘‘तू अपनी चिन्ता कर रचना को कोई कष्ट नहीं हो सकता क्योंकि उसके लिए मैंने ऊँचा खानदान देखा है और खूब दान दहेज देकर उसे विदा करूंगा इस सब में तुलसी की पूजा पाठ से कोई फर्क नहीं पड़ता’’
तब पुष्पा ने कहा ‘‘पिताजी भगवान की मर्जी के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल सकता यह सब भगवान की ही कृपा है’’
पृथ्वी सिंह ने गुस्से में कहा ‘‘ठीक है मैं तेरा विवाह किसी गरीब घर में कर दूंगा फिर देखता हूं तेरी पूजा पाठ कैसे काम आती है’’
पृथ्वी सिंह ने रचना की शादी के बाद पुष्पा की शादी एक लकड़हारे से कर दी और उसे कुछ भी दान दहेज नहीं दिया। पुष्पा खुशी खुशी अपने पति के साथ उनकी छोटी सी झोपड़ी में रहने लगी वहीं आंगन में तुलसी मैया का पौधा लगा कर उनकी पूजा करने लगी।
कुछ दिन बाद बरसात का मौसम शुरू हो गया ऐसे में लकड़ी काटने का काम नहीं मिल पा रहा था। पुष्पा के घर में काफी परेशानी होने लगी। एक दिन वह अपने पति के साथ मन्दिर गई वहां वे पूजा कर रहे थे तभी उन्हें एक सेठ जी मिले सेठ जी उन्हें जानते थे। उन्होंने कहा ‘‘तुम मेरे साथ चलो मेरा लकड़ी का व्यापार है। जिसे संभालने वाला कोई नहीं तुम मेरा व्यापार संभाल लो।’’
पुष्पा के पति ने उनका व्यापार सभांल लिया व्यापार में काफी मुनाफा होने लगा। जिससे पुष्पा व उसके पति के दिन बदल गये उन्होंने काफी बड़ा मकान बना लिया। वे बहुत अमीर हो गये।
एक दिन पुष्पा मन्दिर से वापस आ रही थी तो उसने देखा एक पेड़ के नीचे रचना बैठी रो रही है। पुष्पा ने उसे चुप कराया और रोने का कारण पूछा तो रचना ने बताया ‘‘मेरे पति बहुत बीमार हैं उनकी बीमारी मैं सारा पैसा खर्च हो गया है हम गरीब हो गये अब उनके इलाज के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं हैं। उधर पिताजी का व्यापार भी बंद हो गया।
मुझे अपनी करनी पर बहुत पछतावा हो रहा है। मैं जिन्दगी भर तुलसी मैया को बुरा भला कहती रही इसी कारण मेरा यह हाल हुआ है। और तुम्हारे जाने के बाद पिताजी ने आंगन में लगे तुलसी के पौधे की देखभाल नहीं की जिससे वह सूख गया और उसके साथ ही घर की सुख समृट्ठी भी चली गई’’
तब पुष्पा रचना को अपने घर ले गई उसे काफी धन दिया। रचना ने उससे अपने पति का इलाज करवाया। कुछ दिन बाद पुष्पा अपने पिता के घर गई पुष्पा के पति ने पृथ्वी सिंह के व्यापार में पैसा लगा कर उसे फिर से पहले जैसा कर दिया। पृथ्वी सिंह अपने किये पर बहुत पछता रहे थे।
सबने मिलकर आंगन में मॉं तुलसी का पौधा लगाया और नियम से मॉं की पूजा करने लगे।


















