#1 सुधा की पहचान

गांव के स्कूल से बच्चे दौड़ते हुए घर की ओर चल दिये। सुधा भी जल्दी से अपना बस्ता संभाल कर घर की ओर चल दी। तभी स्कूल के प्रिंसीपल ने उसे रोका और कहा – ‘‘सुधा कल अपने पिताजी को स्कूल लेकर आना। तुम्हारी दो महीने की फीस नहीं आई है।’’
सुधा यह सुनकर सकपका गई वह बोली – ‘‘सर वो पिताजी नहीं हैं। मां है लेकिन वो खेत में मजदूरी करने जाती है। स्कूल नहीं आ पायेगी। मैं मां को बोल दूंगी एक दो दिन में फीस जमा कर देंगे।’’
प्रिंसीपल ने यह बात सुनी तो उन्हें थोड़ा तरस आया उन्होंने कहा – ‘‘अच्छा ठीक है। मैं पन्द्रह दिन की छूट देता हूं। तब तक फीस जमा करा देना।’’
यह सुनकर सुधा के चेहरे पर एक फीकी सी हंसी आई लेकिन कुछ ही देर में उसे कुछ याद आया और हंसी चली गई। वह बड़बड़ाने लगी – ‘‘जमींदार कुछ छोड़ेगा तभी तो फीस दे पायेगी मेरी मां।’’
प्रिंसीपल ने पूछा – ‘‘अब क्या हुआ क्या बड़बड़ा रही है?’’
सुधा ने डरते डरते कहा – ‘‘सर आप मेरा नाम काट दीजिये मेरी मां फीस नहीं दे पायेगी। मां को जैसे ही पैसे मिलते हैं जमींदार अपना कर्जा लेने आ जाता है। मेरी मां को गाली देता है, मारता है और सारे पैसे छीन कर ले जाता है। मेरे बापू ने जो कर्जा लिया था वो चुका नहीं पाये इसलिये उन्होंने फांसी लगा ली। अब वही कर्जा मेरी मां के लिये फंदा बन चुका है। डर लगता है कहीं मां भी कुछ कर न ले।’’
यह कहकर सुधा बिना जबाब का इंतजार किये घर की ओर चल दी। प्रिंसीपल महोदय सोच में पड़ गये -‘‘छोटी सी बच्ची कितनी बड़ी बात कह गई।’’
अगले दिन सुधा स्कूल नहीं आई। प्रिंसीपल साहब बैचेन हो गये। वो चौकीदार को साथ लेकर उसके घर पहुंचे – ‘‘बेटा क्या बात है आज स्कूल नहीं आईं।’’
‘‘सर फीस कहां से देगी मेरी मां। मैंने मां से कुछ नहीं बताया। आप चले जाईये मैं मां को झूठ बोल दूंगी कि स्कूल गई थी।’’
प्रिंसीपल बोले – ‘‘कोई बात नहीं बेटी तुम कल से स्कूल आ जाना तुम्हारी फीस मैंने भर दी है। तुम पढ़ लिख जाओगीं तो तुम्हारी मां को मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी। वादा करो मन लगा कर पढ़ोंगी।’’
यह सुनकर सुधा खुश हो गई वह बोली – ‘‘सर मैं बड़ी होकर आपके सारे पैसे चुका दूंगी। मैं वादा करती हूं। एक दिन आपका और अपनी मां का नाम रोशन करूंगी।’’
प्रिंसीपल साहब वापस स्कूल की ओर चल दिये। आज जो खुशी उन्हें मिल रही थी। उसकी चमक उनके चेहरे पर थी।
















