घर की दिवाली | Moral Story on Diwali

Moral Story on Diwali

Moral Story on Diwali : आज सुबह सुबह घर की घंटी सुनाई दी राकेश ने जैसे ही गेट खोला उनके बड़े भाई घर में आ गये।

राकेश: क्या बात है भैया बहुत परेशान दिख रहे हो।

श्यामशंकर जी: हॉं छोटे तुझसे कुछ जरूरी काम था।

राकेश: आप बैठो भैया में अभी आता हूॅं

राकेश: कविता जल्दी से चाय बना दो पता नहीं क्या बात है भैया कुछ परेशान दिख रहे हैं।

कविता जल्दी से जेठ जी के लिये चाय बनाने में जुट जाती है।

राकेश: जी भैया क्या बात है जो आज आपको हमारी याद आ गई। वैसे तो आप कभी फोन भी नहीं करते।

राकेश की बात सुनकर श्यामशंकर जी थोड़ा से झेंप गये।

श्यामशंकर जी: हॉं जिन्दगी की भाग दौड़ में कभी कभी सब कुछ छूट जाता है।

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राकेश: भैया मैं तो हर महीने कम से कम दो बार आपको फोन करता हूॅं। चलिये छोड़िये इन बातों को ये बताईये बात क्या है?

श्यामनाथ जी: तेरी भाभी चाहती हैं कि इस बार दिवाली हम सब मिल कर मनायें।

यह कहते कहते श्यामनाथ जी की आंखें भर आईं

तभी कविता हाथ में चाय की ट्रे लेकर दाखिल हुई उसे अपने जेठ जी की सारी बातें सुन ली थीं।

कविता: माफ कीजिये भाई साहब लेकिन जब आपने हमें अपने से अलग किया था तो हम अगले तीन साल तक हर साल दिवाली मनानें आपके घर जाया करते थे, लेकिन भाभी जी ने हमें मना कर दिया कि यहां मत आया करो हमारे महमानों के सामने बेज्जती हो जाती है।

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राकेश: हॉं भैया अब यह सब नहीं हो पायेगा। हम आपसे फोन पर बात कर लेंगे।

श्यामशंकर जी: एक बार आ जाना मैं इसके बाद तुम्हें कभी नहीं कहूंगा।

कविता: भाई साहब क्या आपके बच्चों को हमारा आना अच्छा लगेगा। वो पहले ही मुंह बना कर घूमते थे। उनसे भी एक बार पूछ लेते।

इसका कोई जबाब जेठ जी ने नहीं दिया। लेकिन उनकी आंखों में गहरी खामोशी थी, जो आंसू के रूप में उनकी आंखों से छलकने वाली थी।

कविता ने कुछ और कहना चाहा लेकिन राकेश ने इशारे से मना कर दिया।

राकेश: ठीक है भैया आप इतना कह रहे हैं तो हम आ जायेंगे।

यह सुनकर उनके चहरे पर एक संतोष का भाव आ गया।

राकेश: भैया खाना खाकर जाइयेगा। नहीं तो मैं छोड़ दूंगा आपको।

श्यामशंकर: नहीं मुझे जाना होगा दोपहर की बस मिल जायेगी तो शाम तक पहुंच जाउंगा।

राकेश: कहां जा रहे हैं आप आपका घर तो पास ही मैं है।

यह सुनकर श्यामशंकर जी ने कोई जबाब नहीं दिया और उठ कर खड़े हो गये।

श्यामशंकर: नहीं नहीं मुझे चलना चाहिये। बस तुम यह रख लो यहां आ जाना।

उन्होंने एक कागज का टुकड़ा राकेश के हाथ में पकड़ा दिया।

राकेश: अच्छा दिवाली के लिये इंतजाम कहीं और किया है क्या।

यह सुनकर श्यामशंकर जी ने कुछ नहीं कहा चुपचाप घर से निकल गये।

उनके जाते ही राकेश ने कागज का टुकड़ा देखा वह एक चिट्ठी थी।

राकेश चिट्ठी पढ़ने लगा –

श्यामसुंदर जी: मेरे भाई शायद यह सब मैं तुम्हें बता नहीं पाता इसलिये चिट्ठी में लिख रहा हूं। तुम्हारी भाभी और मैं अब यहां नहीं रहते हम हरिद्वार के एक वृद्धा आश्रम में रहते हैं, जिसका पता आखिरी में लिखा है। आज से तीन साल पहले मैं रिटायर हो गया। मेरा बेटा रवि और उसकी बहु ने हमारा सारा पैसा व्यापार करने के नाम पर ले लिया। उन्होंने मकान भी गिरवीं रख दिया। उसके बाद हमें घर से निकाल दिया। अब हम दोंनो वृद्धा आश्रम में रहते हैं। अपना कोई नहीं है। बेटा बहु कभी फोन तक नहीं करते। तुम्हारी भाभी को केंसर हो गया है। शायद यह उसकी आखिरी दिवाली है। इसलिये चला आया तुम पर शायद अभी भी कुछ हक समझता हूं। हो सके दिवाली के बहाने एक बार हमसे मिलने आ जाना। अच्छा लगेगा। कुछ कहा सुना हो तो माफ कर देना।

पत्र पढ़ कर राकेश फूट फूट कर रोने लगा। कविता के पूछने पर उसने वह पत्र पकड़ा दिया।

कविता ने भी पत्र पढ़ा और रोने लगी।

कविता: हे भगवान जेठ जी इतने कष्ट भोग रहे हैं और मैंने उन्हें इतना कुछ सुना दिया। उन्होंने जबाब तक नहीं दिया।

राकेश: जीवन के आखिरी दिनों में ऐसा होगा ये सोचा नहीं था। यकीन नहीं होता ये वही भैया हैं। जो शान से रहते थे महंगी गाड़ीयों में घूमते थे।

कविता: आप क्या सोचते हो?

राकेश: कुछ समझ नहीं आ रहा।

कविता: समझना क्या है हम कल ही चलते हैं, भैया भाभी को लेने उन्हें वृद्धा आश्रम में तो नहीं रहने देंगे। उन्हें यहां लाकर उनकी सेवा करेंगे।

राकेश: लेकिन पुरानी बातें।

कविता: वो उस समय की बातें हैं जब उनका बेटा विदेश में नौकरी करता था उनकी भी अच्छी नौकरी थी। पैसे के घमंड में वे किसी को कुछ नहीं समझते थे। भाभी ने हमें भी बेज्जत करके घर से निकाल दिया। लेकिन हम उन्हें इस हाल में नहीं छोड़ सकते।

राकेश: हॉं तुम सही कह रहीं हों। आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि तुमसे शादी करना मेरे जीवन का सबसे अमूल्य निर्णय था।

अगले दिन राकेश और कवित वृद्धा आश्रम पहुंच जाते हैं। उन्हें देख कर श्यामशंकर जी आश्चर्य में पड़ जाते हैं। उनकी पत्नि सुमित्रा जी की आंखों से टप टप आंसू बह रहे थे।

कविता: क्या दीदी यहां आने की क्या जरूरत थी। आपका एक घर और भी है आप भूल गईं।

सुमित्रा जी: तुझसे बुरा बर्ताव करके कभी सुख से नहीं रह पाई। मैं तुझे देवरानी समझ कर बहस करती रही लेकिन तू मुझे अपनी सास का स्थान देकर मेरी हर बात पर चुप रही।

राकेश: भाभी आपका एक बेटा धोखा दे गया तो क्या दूसरा बेटा है न आपकी सेवा करने के लिये। चलिये अब हम आपके साथ नहीं आप हमारे साथ दिवाली मनायेंगे और वो भी हमेशा।

राकेश और कविता वृद्धा आश्रम के मैंनेजर से उन्हें ले जाने के लिये जरूरी कार्यवाही कर रहे थे।

श्यामशंकर जी एक तरफ खड़े रो रहे थे।

तभी वृद्धा आश्रम के अन्य सदस्य आकर खड़े हो गये।

एक आदमी: ऐसा पहली बार हुआ है कि यहां से कोई अपने घर जा रहा है। हमने तो लोगों को यहां केवल शमशान जाते देखा है।

दूसरा आदमी: बहुत किस्मत वाले हो श्यामशंकर आजकल अपना सगा बेटा मॉं बाप को नहीं रखता। तुम्हें लक्ष्मण जैसा भाई मिला है।

सब को अलविदा कहकर चारों गाड़ी में सामान रख कर घर की ओर चल दिये।

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Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.