Hindi Motivational Story : निरंजन जी अपने घर के बरामदे में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। तभी उनकी पत्नि संतोष ने चाय देते हुए पूछा
संतोष: आज आप अखबार ही पढ़ते रहोगे या कोई और काम भी करोगे।
निरंजन जी: हॉं हॉं आज की छुट्टी पूरी तुम्हारी बताओ क्या काम करना है।
संतोष: वो मैं सोच रही थी देवर जी के घर जाने की
निरंजन जी: क्या राकेश के घर, नहीं मैं वहां नहीं जाउंगा, तुम जानती नहीं अपना हिस्सा मांगने के लिये उसने कितनी बेज्जती की थी हमारी। बाबूजी के मरते ही उसे हिस्सा लेने की इतनी जल्दी थी कि तेरहवीं तक भी नहीं रुका पहले ही लड़ाई झगड़ा शुरू कर दिया।
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संतोष: वो सब तो ठीक है लेकिन इस बात को पांच साल बीत गये।
निरंजन जी: तो इन पांच सालों में वो एक बार भी हमसे मिलने आया? या कभी फोन पर बात की, वैसे आज अचानक वहां जाने की जिद्द क्यों कर रही हों।
संतोष: नहीं कुछ नहीं बस ऐसे ही।
निरंजन जी: मैं तुम्हें जानता हॅंू, तुम कोई काम ऐसे ही नहीं करती सच सच बताओ क्या बात है।
संतोष: कल मुझे बाजार में उनके घर में काम करने वाली रूपा मिली थी वह बता रही थी कि अपनी काजल को कोई बड़ी बीमारी हो गई है। महीने में दो बार उसे लेकर दिल्ली इलाज कराने जाते हैं और एक सप्ताह रुक कर आते हैं।
निरंजन जी: क्या काजल? क्या हुआ उसे?
संतोष: रूपा को कुछ ज्यादा नहीं पता था। वो तो कह रही थी सारा पैसा बेटी की बीमारी में लग गया। अब तो मकान बेचने की तैयारी हो रही है। मुझे भी कह दिया है कि कहीं और काम ढूंढ लो।
यह सुनकर निरंजन जी असहज हो गये।
निरंजन जी: इतना नालायक है कुछ बता नहीं सकता चलो अच्छे में न सही बुरे समय में तो खबर दे सकता है पर उसकी तो नाक कट जायेगी मदद मांगने में।
संतोष: सुनो जी मैं तो कहती हूॅं छोड़ दो पुरानी बातें, चलो एक बार मिल आते हैं।
निरंजन जी: ठीक है तुम तैयार हो मैं गाड़ी निकालता हूॅं।
दोंनो राकेश के घर पहुंच जाते हैं। संतोष आगे बढ़ कर घंटी बजाती है निरंजन जी कुछ पीछे खड़े थे।
मधु गेट खोलती है। संतोष और निरंजन जी को सामने देख कर सकपका जाती है। उसकी आंखें झलक आती हैं। एकटक देखने के बाद –
मधु: दीदी आप (कहकर गले लग जाती है और रोने लगती है)
संतोष: अरे रो क्यों रही है देख तेरे भैया भी आये हैं।
मधु अपने को संभालते हुए निरंजन जी के पैर छूती है। दोंनो को अंदर लेकर आती हैं।
अंदर आते ही दोंनो दंग रह जाते हैं। घर का आधे से ज्यादा सामान गायब था। ड्राइंग रूम में जहां शानदार सोफा पड़ा होता था। वहां दो प्लास्टिक की कुर्सीयां पड़ी थीं। दोंनो बैठ जाते हैं।
निरंजन जी: राकेश कहां है?
मधु: जी वो काम पर गये हैं। मैं अभी फोन करती हूॅं आ जायेंगे।
मधु जल्दी से दोंनो के लिये पानी लाती है। किचन में जाकर चाय चढ़ा देती है। संतोष उसके पीछे पीछे किचन में पहुंच जाती है।
किचन का हाल देख कर उसे बहुत बुरा लगता है। बड़ा सा फ्रिज, माईक्रोवेव सब गायब था।
संतोष: काजल कहां है? क्या हुआ उसे मैंने सुना है उसकी तबियत ठीक नहीं है।
अब मधु के सब्र का बांध टूट गया। वह फूट फूट कर रोने लगी।
मधु: दीदी काजल को केंसर हो गया है। न जाने हमारे कौन से कर्मों की सजा हमें मिल रही है। दिल्ली से इलाज चल रहा है। सारी जमा पूंजी लगा चुके हैं। घर का सामान भी बेच कर उसका इलाज करा रहे हैं। अब सोच रहे हैं इस मकान को बेच कर दिल्ली में कहीं किराये पर चले जायें।
संतोष की आंखों से भी आंसू बह निकले।
संतोष: इतना सब कुछ हो गया हमें बता नहीं सकती थी। इतना पराया कर दिया तुम लोगों ने हमें।
मधु: नहीं दीदी मैंने तो कई बार इनसे कहा। लेकिन ये बोले क्या मुंह लेकर जाउं भैया के पास पहले ही उनकी इतनी बेज्जती कर चुका हूॅं।
संतोष: हम घर वाले हैं कोई रिश्तेदार नहीं अच्छे में न सही बुरे वक्त में तो इकट्ठे हो सकते हैं। चिन्ता मत कर सब ठीक हो जायेगा।
मधु आंसू पौछ कर चाय बनाने लगी। तभी गेट की घंटी बजी।
मधु ने गेट खोला राकेश ने अंदर आकर निरंजन जी के पैर छुए उसे देख कर निरंजन जी अंदर तक हिल गये।
राकेश जिसके चेहरे से हमेशा तेज टपकता था। रौबदार भरा हुआ चेहरा। शानदार कपड़े पहने बुलट पर घूमने वाला उनका भाई आज उसे पहचानना मुश्किल हो रहा है। पीला पड़ा चेहरा गाल अंदर धसे हुए। बालों में सफेदी छलकने लगी थी।
निरंजन जी: ये क्या हाल बना रखा है, इतना कुछ हो गया मुझे बता नहीं सकता था।
राकेश बिना कुछ बोले अपराधी की तरह सिर झुकाये खड़ा था। उसकी आंखे नम थीं।
संतोष: देवरजी आपने तो हमें पराया कर दिया। ऐसी भी क्या नाराजगी।
राकेश ने भाभी के पैर छुए और बोला –
राकेश: नहीं भाभी ऐसी बात नहीं है। हिम्मत नहीं पड़ रही थी आप लोगों के सामने जाने की। जो मैंने आपके साथ किया शायद उसी की सजा मिल रही है।
निरंजन जी: नालायक हमेशा उल्टी बातें ही करता है। बचपन में तो हर बात अपने भाई से शेयर करता था। आज क्या हो गया।
राकेश फूट फूट कर रोने लगा और निरंजन जी के गले लग गया। निरंजन जी की भी आंखें नम हो गईं।
संतोष और मधु भी रोने लगीं।
निरंजन जी: चल कोई बात नहीं ये बता काजल कहां है।
मधु: भैया अंदर के कमरे में दवा खाकर सो रही है। मैं अभी जगाती हूं उसे।
संतोष: नहीं आराम करने दे उसे। वैसे डॉक्टर क्या कहते हैं।
राकेश: पता नहीं भाभी। लंबा इलाज चलेगा।
निरंजन जी: चिन्ता मत कर मैं देखता हूॅं। तू उसकी सारी रिर्पोट की कॉपी मुझे दे।
संतोष: ये मकान बेच कर दिल्ली जाने की सोच रहे हैं।
निरंजन जी: नहीं मकान नहीं बिकेगा। मैं सब सम्हाल लूंगा। तेरा दिल्ली में रहने का इंतजाम भी हो जायेगा।
राकेश: भैया मुझे माफ कर दीजिये। मैंने आपके साथ बहुत गलत किया।
निरंजन जी: वो तो तू हमेशा करता है बचपन में भी शरारत तू करता था और मार मुझे पड़ती थी।
यह कहकर निरंजन जी हसने लगे।
निरंजन जी: अब भी मैं तुझे बचा लूंगा।
तभी मधु चाय ले आई। सबने मिलकर चाय पी।
मधु: भाभी काजल उठ गई है।
चारों काजल के कमरे में पहुंच जाते हैं।
सामने पलंग पर कमजोर सी लड़की, आंखों में गढ्ढे। मुरछाया चेहरा। एकटक सबको देख रही थी।
संतोष: अपनी बड़ी मम्मी को भूल गई। बेटा!
काजल को संतोष ने गले लगा लिया।
निरंजन जी: मेरा शेर बच्चा कैसे बकरी बन गया। ताया जी के साथ रहता तो कभी बकरी नहीं बनता। तेरा बाप तुझे खाने को नहीं देता क्या।
काजल: आप मुझसे मिलने नहीं आये। आपकी चोकलेट नहीं मिली इसलिये कमजोर हो गई।
निरंजन जी: तू ठीक हो जा फिर तुझे हम अपने घर ले जायेंगे।
सबसे मिल कर दोंनो घर की ओर चल दिये।
घर पहुंच कर निरंजन जी गहरी चिंता में डूब गये।
निरंजन जी काजल की रिर्पोट लेकर अपने डॉक्टर से बात करते हैं। वह उन्हें एक स्पेस्लिस्ट से मिलवाता है।
एक सप्ताह बाद वे दोंनो राकेश के घर पहुंच जाते हैं।
निरंजन जी: सुन मैंने सारा इंतजाम कर दिया है। काजल का इलाज दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल में होगा। भगवान ने चाहा तो जल्दी ही वह ठीक हो जायेगी। सरकारी अस्पताल के भरोसे कुछ नहीं हो पायेगा।
राकेश: लेकिन भैया उसमें तो बहुत खर्च आयेगा।
निरंजन जी एक बैग उसके आगे सरका देते हैं।
निरंजन जी: ये पचास लाख हैं मैंने गॉव की जमीन बेच दी।
राकेश और मधू की आंखों से टपटप आंसू बह रहे थे।
राकेश: भैया ये आपने क्या किया। मैं तो अपना हिस्सा पहले ही बेच चुका हूं। अब आपने भी अपना हिस्सा बेच दिया।
निरंजन जी: जब बात अपने बच्चे की हो तो सब कुछ फीका लगता है। तू जाने की तैयारी कर मैंने वहां तेरे रहने का भी इंतजाम कर दिया है। ये पचास लाख अगर कम पड़े तो घबराना मत मेरे पर कुछ सेविंग भी हैं।
छह महीने के इलाज के बाद काजल ठीक हो जाती है।
आज काजल घर आ रही थी। निरंजन जी और संतोष ने पूरा घर फूलों से सजाया। काजल जैसे ही घर आयी उसका जोरदार स्वागत किया गया। राकेश और मधु जैसे ही घर के अंदर आये वे चौक गये।
पूरा घर बिल्कुल नया लग रहा था जैसे अभी अभी पेंट किया गया है। नये सोफे किचन में बड़ा फ्रिज। सब पहले जैसा था।
राकेश रोते हुए अपने भाई के गले लग गया।
निरंजन जी: मैंने कहा था न सब ठीक हो जायेगा।
मधु: भाभी आपने ये सब क्यों कर दिया आपका कर्ज हम कैसे चुकायेंगे।
संतोष: पागल घर वालों पर कोई कर्ज नहीं होता। हमारे रहते तुम कष्ट उठाओ ये भी तो नहीं हो सकता।
सबने मिलकर काजल के से केक कटवाया।
तभी वहां रूपा आ गई।
संतोष: इसे मैंने बुलाया है। यह यहां काम करेगी। चिंता मत कर इसकी पगार मैं दे दूंगी।
राकेश: नहीं भाभी अब मैं पूरे जोश से काम करूंगा सब संभाल लूंगा।
निरंजन जी और संतोष उनसे विदा लेकर घर की ओर चल दिये। अपना सबकुछ लुटा कर अपना परिवार पा लेने पर खुद को गर्वान्वित महसूस कर रहे थे।
















