बूढ़े भिखारी की कहानी | Bhikari ki Kahani

Bhikari ki Kahani

Bhikari ki Kahani : एक समय की बात है बनारस की एक गली एक बूढ़ा आदमी भीख मांग कर गुजारा कर रहा था। बनारस में वह एक चबूतरे पर बैठा आने जाने वालों को देखता रहता था। किसी से कुछ नहीं कहता था। जो भी उसे भीख में कुछ दे जाता उसे धन्यवाद वाली निगाहों से देखता रहता था।

उसी गली से एक पंडित जी सुबह सुबह निकल कर गंगा स्नान के लिये जाते थे। जब पंडित जी जाते तो वह सो रहा होता। बाद में जब पंडित जी वापस आते तो वह वहां से हट जाता।

पंडित जी उसके ठिकाने पर कुछ पैसे और प्रसाद रख कर चले जाते। वह बूढ़ा आदमी जब पंडित जी चले जाते तो जाकर पैसे उठा कर पास की दुकान से एक कुल्हड़ में चाय ले आता और प्रसाद खाकर चाय पीकर वहीं बैठ जाता।

दिन भर लोग उसे कुछ न कुछ देते रहते थे। शाम के समय वही पंडित जी गंगा आरती में शामिल होने जाते और वापस आते समय उसके लिये खाना लेकर आते और उसके बैठने की जगह पर रख कर ढक देते।

उनके जाने के बाद वह भिखारी आता और खाना खाकर वहीं सो जाता। कई सालों से यही सिलसिला चल रहा था।

पडिंत जी का एक शिष्य कुछ दिन से पंडित जी से ज्ञान प्राप्त कर रहा था। पंडित जी उसे शास्त्र अध्ययन के साथ साथ पूजा पाठ का विधि विधान सिखा रहे थे। वह भी पंडित जी के साथ सुबह जाता और शाम तक पंडित जी के साथ रहता।

एक दिन दोपहर के समय पंडित जी विश्राम कर रहे थे तो उनके शिष्य ने पूछ ही लिया – ‘‘गुरु जी आप उस भिखारी पर इतने मेहरबान क्यों हैं यहां तो बहुत से भिखारी रहते हैं लेकिन आप उन्हें बिल्कुल भी दान नहीं देते। फिर इस भिखारी के लिये इतना कष्ट क्यों उठाते हो।’’

पंडित जी ने जबाब दिया – ‘‘मैं जब भी इसे देखता हूं मेरा मन करुणा से भर जाता है’’

शिष्य – ‘‘नहीं गुरुजी आप मुझसे सच छिपा रहे हैं, यह आपको देख कर छिप जाता है। इसका क्या राज है? आज आपको बताना ही पड़ेगा।

पंडित जी – ‘‘अच्छा बहुत जिद करते हो तो सुनो – यह अपने समय में बनारस का बहुत बड़ा सेठ था। दिन रात पैसे कमाने में लगा रहता था। यह न कभी पूजा पाठ करता, न कभी प्रभु का नाम लेता, न किसी को एक रुपया दान में देता था।

इसके कोई सन्तान नहीं थी। एक दिन इसकी पत्नि ने घर पर पूजा रखने की बात इससे पूछी तब इसने मना कर दिया। लेकिन बहुत अनुनय करने पर यह पूजा में बैठने के लिये तैयार हुआ।

उस समय मैंने ही इसके घर में पूजा करवाई थी। पूजा के बाद इसने न तो एक रुपया दान किया न किसी को भोजन करवाया। मेरे साथ चार पंडित और थे। जिन्हें बहुत बुरा लगा। वे अपना अपमान समझ कर वहां से चले गये।

पुत्र की कामना से की गई पूजा के फल स्वरूप दो साल बाद इसके घर एक कन्या का जन्म हुआ।

यह देख कर सेठ को बहुत गुस्सा आया, वह उस कन्या से नफरत करने लगा। उसकी शक्ल भी नहीं देखता था।

पत्नि के बार बार समझाने पर भी वह नहीं माना और इसी गम में उसकी पत्नि चल बसी इसके बाद वह लड़की उसे बोझ लगने लगी।

धीरे धीरे कन्या बड़ी हो गई। अब सेठ को उसके विवाह के लिये वर ढूंढना था।

एक दिन सेठ ने पैसा बचाने के लिये उस कन्या का विवाह एक भिखारी से कर दिया।

मुझे विवाह पढ़ने के लिये बुलाया गया। भिखारी को देख कर मैंने सेठ को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन वह नहीं माना भिखारी के साथ कन्या को विदा कर दिया।

कन्या के विदा होने के कुछ दिन बाद ही एक जंगल में उसका शव मिला भिखारी ने उसके पैसे जेवर सब छीन लिया उसे मार कर जंगल में डाल दिया।

सेठ ने उसका अन्तिम संस्कार किया।

उसके बाद से सेठ का सारा कारोबार चौपट हो गया। आज वह इस स्थिती में है यह तुम्हारे सामने है। अपनी पत्नि और बेटी को याद कर यह रोता रहता है। जिस पैसे को बचाने के लिये बेटी का विवाह भिखारी से कर दिया। आज वही पैसा उसके पास नहीं है।

क्योंकि मैंने सेठ के अच्छे दिन देखें हैं। इसको राजा से रंक बनते देखा है। इसकी आंखों में पछतावा देखा है। इसलिये मैं इसके खाने की व्यवस्था कर देता हूॅं।

शिष्य – ‘‘लेकिन यह आपको देख कर भाग क्यों जाता है।

पंडित जी – ‘‘एक स्नेह का रिश्ता इसके साथ बन गया है। इसे लगता है जो भी उससे स्नेह करते थे वे अब इस दुनिया में नहीं हैं। कहीं इसके स्नेह में मेरी जान न चली जाये’’

एक दिन सुबह सुबह पंडित जी तैयार हो रहे थे, तभी उस शिष्य ने बताया –

‘‘गुरुजी वह बूढ़ा भिखारी कल रात मर गया’’

यह सुनकर पंडित जी को बहुत दुख हुआ और वे उसके अंतिम संस्कार की तैयारी मैं जुट गये।

Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.