Education Story in Hindi : एक गांव में एक दुकान थी। गांव में एक ही दुकान होने से उसका मालिक रतिराम पूरे गांव वालों को लूटता रहता था।
शहर बहुत दूर था। इसलिये रतिराम अपने समान के बहुत ज्यादा भाव रखता था। गांव वालों को मजबूरी में समान लेना पड़ता था।
एक दिन एक किसान रतिराम की दुकान पर आया
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किसान : भाई ये गुड़ कैसे दिया?
रतिराम : सौ रुपये का पांच किलो।
किसान : ये तो बहुत ज्यादा है। शहर में तो बीस रुपये का पांच किलो मिलता है।
रतिराम : तो वहीं जाकर ले लो मैंने मना किया है क्या। जब यहां से दो दिन में शहर पहुंचोगे वहां से गुड़ लेकर गांव आओगे। भाड़े में ही ढेड़ सौ रुपये लग जायेंगे। चार दिन का काम का नुकसान करके यही गुड़ एक सौ सत्तर का पड़़ेगा। अब जल्दी बताओ लेना है कि नहीं।
किसान दुःखी होकर गुड़ लेकर चला जाता है। इसी तरह पूरा गांव लालची बनिये से परेशान था। लेकिन इसका कोई उपाय नजर नहीं आ रहा था।
लालची रतिराम कभी कभी गरीबों को उधार में समान दे देता था। बदले में दुगना तिगना ब्याज लगा कर कभी उनके घर के बरतन कभी उनके पशु अपने कब्जे में कर लेता था।
गांव में सुजानसिंह एक गरीब किसान खेती से किसी तरह गुजर बसर करता था। उसकी एक गाय को रतिराम ने अपने कब्जे में रख रखा था। उधार पर ब्याज बढ़ता जा रहा था। सुजानसिंह किसी तरह अपनी गाय वापस लेना चाह रहा था।
सुजानसिंह : रतिराम ये गाय मुझे वापस कर दे इसका दूध बेच कर मैं तेरे पैसे चुका दूंगा।
रतिराम : जब गाय मेरे कब्जे में है तो दूध भी तो मेरा हुआ तुझे कैसे दे दूं। पहले पूरा कर्ज चुका फिर गाय ले जाना।
सुजानसिंह को बहुत गुस्सा आया। एक दिन अपने घर वालों को समझा बुझा कर सुजान सिंह शहर चला गया।
वहां उसने देखा कि समान बहुत सस्ता है। वह लाला से तो परेशान था ही वह एक सेठ की दुकान पर नौकरी करने लगा परचून की दुकान पर नौकरी करते करते उसे एक साल हो गई। वह पैसे घर भेजता रहा इसी बीच उसे दुकान के पूरे सामान की जानकारी हो गई कि कितने का माल आता है कितने का बिकता है।
एक दिन उसने अपने सेठ जी को अपने गांव का हाल बताया।
यह सुनकर सेठ जी ने कहा –
सेठ जी : तू एक काम कर सुजानसिंह गांव में मेरे नाम से एक दुकान खोल ले जो भी प्रोफिट होगा आधा आधा। माल मैं भेज दूंगा। लेकिन कभी बेईमानी मत करना।
सुजानसिंह : मालिक इसी बेईमानी ने तो मुझे शहर में लाकर पटका है मैं तो बस उस लाला को सबक सिखाना चाहता हूं। हमेशा आपकी गुलामी करता रहूंगा।
सेठ जी बहुत खुश हुए उन्होंने सारा इंतजाम कर दिया।
सुजान सिंह को गांव भेज दिया। सुजानसिंह ने ठीक लाला के सामने एक दुकान किराये पर ले ली। उसके एक सप्ताह बाद ट्रक भर कर सामान आ गया। पूरी दुकान सेठ जी के नौकर आकर सजा गये।
यह देख कर रतिराम को बहुत सदमा लगा। वह फटाफट सुजानसिंह के पास पहुंच गया।
रतिराम : क्यों बे ये दुकान खोलने के लिये पैसा कहां से आया मेरा कर्जा कब चुकायेगा। देख नहीं तो ब्याज बढ़ते बढ़ते इतना हो जायेगा कि ये दुकान भी मेरी हो जायेगी।
सुजानसिंह : चल बता तेरा कितना पैसा है?
रतिराम फटाफट बही खाता देख कर पैसे बताता है। सुजानसिंह उसे उसके पैसे दे देता है। यह देख कर रतिराम पूछता है –
रतिराम : कहीं डाका डाल कर आया है क्या? मैं तेरी रिर्पोट लिखाने जा रहा हूं।
सुजानसिंह : मैं तो नौकर हूं ये तो शहर में बैठे मेरे सेठ जी की दुकान है। बोर्ड पर देख उनका लिखा है। शहर जाकर उनसे पूछ।
रतिराम घबरा जाता है। फिर वह सुजानसिंह से प्यार से बात करने लगता है। वह कहता है –
रतिराम : एक काम करते तेरा लाला तो शहर में बैठा है उसे क्या पता तू कितने का सामान बेच रहा है। तू मेरे वाले रेट पर सामान बेच इससे तुझे दुगनी बचत होगी उपर से तनख्वाह अलग से मिलेगी और मेरी दुकानदारी खराब नहीं होगी। ग्राहक यहां से ले या मेरी दुकान से रेट एक ही रहेगा।
सुजानसिंह : लाल तेरा धन्यवाद करना चाहता हूं तेरे कारण ही आज मैं यहां तक पहुंच पाया। न तू मेरी गाय हड़पता न मैं शहर नौकरी करने जाता न यह दुकान खुलती। ये दुकान मैंने तेरे जुल्मों के शिकार गांव वालों की भलाई के लिये खोली है। यहां तो शहर से भी सस्ता माल बिकेगा। चल भाग यहां से।
धीरे धीरे सुजानसिंह की दुकान चलने लगती है। रतिराम की दुकान पर एक भी ग्राहक नहीं होता।
धीरे धीरे सुजानसिंह गांव वालों को उधार भी देने लगा वो भी बिना ब्याज के इससे गांव वाले बहुत खुश हुए। महीने में एक दिन सुजानसिंह शहर जाकर पूरा हिसाब सेठ जी को दे आता और सेठ ही उसे उसका हिस्सा दे देते।
धीरे धीरे सुजानसिंह ने दो नौकर भी दुकान पर रख लिये, अब उसने दूसरे गांव में भी दुकान खोलना शुरू कर दिया।
इधर लाला की दुकान का सारा समान सड़ने लगा उसके आटे में कीड़े लग गये।
लाला बहुत सस्ता सामान बेचने लगा लेकिन सुजानसिंह के व्यवहार के कारण लाला से कोई कम पैसों में भी सामान नहीं लेता था।
शिक्षा : लालच का घड़ा किसी न किसी दिन फूटता ही है।
Image Source : playground


















