Short Story in Hindi with Moral : एक गांव में रंजन नाम का एक लड़का रहता था उसके पिता रघुनंदन जी गॉव के विद्यालय में अध्यापक थे।
रंजन भी पढ़ने में बहुत तेज था। रंजन की मां सावित्री घर का काम संभालती थीं।
रंजन जब भी विद्यालय जाता उसके पिता उससे बात नहीं करते थे। वे अन्य विद्यार्थियों से अच्छे से बात करते थे।
एक दिन रंजन विद्यालय से घर आया तो सावित्री जी ने उसे खाना खाने के लिये दिया तब रंजन ने मां को गुस्सा दिखाते हुए कहा –
रंजन: मां मैं उस विद्यालय में पढ़ने नहीं जाउंगा। पिताजी मुझसे बात नहीं करते जबकि वे मेरे साथ पढ़ने वाले सभी छात्रों से अच्छे से बात करते हैं।
सावित्री जी: बेटा पिता के बारे में शंका नहीं करते, यदि वे ऐसा करते भी होंगे तो जरूर उसके पीछे कोई वजह होगी, तू खाना खा ले इस बारे में हम शाम को बात करेंगे।
रंजन उनकी बात मान कर खाना खा लेता है, शाम को जब रघुनंदन जी वापस आते हैं तो सावित्री जी उनसे रंजन से बात न करने का कारण पूछती हैं।
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रघुनंदन जी रंजन को अपने पास बिठा कर कहते हैं –
रघुनंदन जी: बेटा पहली बात तो यह कि ये बात तुम्हें मुझसे पूछनी चाहिये थी। दूसरी बात यह कि तुम मेरे बेटे हो अगर मैं तुम से विद्यालय में बात करूंगा तो अन्य छात्रों का समय नष्ट होगा, क्योंकि एक शिक्षक का सारा समय अपने छात्रों के लिये होना चाहिये तुमसे तो मैं घर पर बात कर ही लेता हूं।
रंजन: पिताजी मुझे माफ कर दीजिये। मेरे मन में ऐसे विचार नहीं आने चाहिये थे।
रघुनंदन जी: बेटा विद्यालय में केवल अपनी शिक्षा पर ध्यान लगाओ उससे सम्बन्धित कोई प्रश्न हो तो अवश्य पूछो।
इसी तरह कुछ समय बीत जाता है। जब भी विद्यालय की छुट्टिी होती तो अधिकतर छात्र घर जाने से पहले बाहर खड़े आईसक्रीम वाले से आईसक्रीम लेते थे।
एक दिन रंजन भी आईसक्रीम लेने पहुंच गया। उसके पास केवल दस पैसे थे।
आईसक्रीम वाला: दस पैसे में आईसक्रीम नहीं आती है। कम से कम पच्चीस पैसे लाओ।
रंजन को बहुत बुरा लगता है वह अपने दस पैसे लेकर घर वापस आ जाता है।
शाम के समय जब उसके पिता घर आते हैं। तो वह गुस्से में उनसे पूछता है –
रंजन: आप हर दिन मुझे दस पैसे देते हैं। लेकिन बच्चे पचास पैसे या एक रुपया लाते हैं और मजे से आईसक्रीम खाते हैं। मुझे कल से कम से कम पच्चीस पैसे चाहिये।
यह सुनकर रघुनंदन जी मुस्कुराने लगते हैं। वे कहते हैं –
रघुनंदन जी: बेटा मैं तुम्हें पचास पैसे दे सकता हूं। लेकिन जानते हो मैं तुम्हें ज्यादा पैसे क्यों नहीं देता। क्योंकि तुम्हारा मन हमेशा बाहर उस आईसक्रीम वाले में लगा रहेगा। दूसरों की नकल करने के बजाय पैसों को बचाना सीखो जिससे किसी अच्छे काम पर लगाओ।
रंजन: लेकिन मैं क्यों पैसे जोड़ कर रक्खु इससे क्या होगा?
रघुनंदन जी: बेटा पैसा बहुत काम आता है मुसीबत पड़ने पर हमेशा पैसा काम आता है। इसे खर्च करने से पहले कई बार सोचना चाहिये। जिस आइसक्रीम की तुम बात करते हो वो बहुत ही गंदे पानी में रंग डाल कर बनाई जाती है। जिससे गला खराब हो जाता है। इसीलिये मैं तुम्हें कम पैसे देता हूं। जिससे तुम उसे खर्च न कर दो।
अगले दिन रघुनंदन जी अपने बेटे के लिये एक गुल्लक ला कर देते हैं।
रघुनंदन जी: रंजन इस गुल्लक में हमेशा कुछ पैसे डालते रहना। आज से मैं तुम्हें पच्चीस पैसे दूंगा।
रंजन पिता की बात मान कर पच्चीस पैसे में से बीस पैसे गुल्लक में डाल देता था।
इसी तरह कई वर्ष बीत जाते हैं। वर्ष बीतने के साथ गुल्लक भी कई हो जाती हैं। एक के बाद दूसरी दूसरी के बाद तीसरी इस तरह लगभग सात गुल्लक पैसों से भर जाती हैं।
रंजन भी अब काफी बड़ा हो चुका था। उसके पिता बूढ़े हो चुके थे वे अब विद्यालय से रिटार्यड हो चुके थे।
एक दिन रंजन के घर एक पत्र आया। रंजन ने पत्र अपने पिताजी को दिया और बोला –
रंजन: पिताजी मुझे स्कालरशिप मिल गई। अब आगे की पढ़ाई मैं शहर जाकर कर सकूंगा।
रघुनंदन जी बहुत खुश हुए। उन्होंने रंजन को गले लगा लिया। तभी सावित्री जी ने कहा –
सावित्री जी: लेकिन बेटा तू वहां रहेगा कहां? वहां तो सब कुछ बहुत मंहगा है।
रंजन ने रघुनंदन जी की ओर देखा। रघुनंदन जी ने हां में सर हिलाया। फिर रंजन ने एक के बाद एक सातों गुल्लक तोड़ दीं। जब उसमें जमा पैसों को गिना तो पाया कि बचपन से जोड़े हुए पैसे बढ़ कर तीस हजार हो चुके थे।
रंजन की आंखों से आंसू बह रहे थे वो बोला –
रंजन: पिताजी आप ठीक कहते थे अपने पर संयम रख कर किसी भी परिस्थिति को जीता जा सकता है। अगर मैं उस समय सारे पैसे आईसक्रीम खाने में उड़ा देता तो आज मेरा आगे पढ़ने का सपना अधूरा रह जाता। और शायद आईसक्रीम खाकर बीमार पड़ता और इलाज में पैसे अलग से लगता।
रघुनंदन जी ने कुछ और पैसे रंजन को दिये। अगले दिन जब रंजन घर से निकलने लगा तो रघुनंदन जी ने उसे एक गिफ्ट दिया। रंजन ने उसे बहुत प्यार से संभाल कर रख लिया।
शहर पहुंच कर वह छात्रावास में पहुंचा अपने कमरे में जाकर अपना सामान सजाया फिर उसे याद आया कि पिता ने गिफ्ट दिया था।
उसने उसे खोला तो देखा उसमें एक गुल्लक थी। यह देख कर रंजन बहुत खुश हुआ।
वह पढ़ाई के साथ साथ खाली समय में काम भी करता और उन सभी पैसों को गुल्लक में डालता रहता।
इस तरह पढ़ते पढ़ते वह एक दिन अपने गांव के विद्यालय में प्रधानाध्यापक बन गया।
शिक्षा: समय और पैसा बहुत संभाल कर खर्च करना चाहिये।
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