मालिक की अमानत | Garib Kisan ki Kahani

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Garib Kisan ki Kahani : मैं आज कई साल बाद गॉव गया तो उसे बहुत कुछ बदला हुआ नजर आया। मैं सीधा अपने घर गया वहां देखा तो कोई नहीं था। तभी पास के घर से रघुबीर चाचा निकल आये। अरे बेटा बहुत दिनों के बाद आये। कैसे हो?

मैंने चाचा के पैर छुए और कहा ‘‘चाचा यह लच्छू कहां गया इसे मैंने घर संभालने के लिये दिया था।’’

यह सुनकर चाचा ने आश्चर्य से देखा – ‘‘बेटा तुम्हें नहीं पता वह तो अभी दो महीने से पागल हो गया है गॉव के बाहर बैठा रहता है कोई कुछ खाने को दे देता है तो खा लेता है।

यह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मुझे यकीन नहीं हुआ कि लच्छू जैसा जिंदा दिल इंसान पागल हो सकता है। मैंने उत्सुकता भरी नजरों से चाचा को देखा तो उन्होंने कहा बेटा पहले घर चलो कुछ खा पीकर आराम कर लो फिर बात करेंगे।

मना करने पर भी वे जबरदस्ती अपने घर ले गये। वहां चाय नाश्ता करने के बाद सबसे पहले मैंने लक्ष्छू के बारे में पूछा। तब चाचा बोले ‘‘बेटा उसकी जिंदादिली ही उसकी दुश्मन बन गई।’’

मैरे सब्र का बांध अब टूट रहा था। मैंने कहा ‘‘चाचा हम तो उसे बचपन से ऐसे ही देखते आ रहे हैं हर हाल में खुश भला उसे किसी की परवाह नहीं थी। ऐसे मस्तमौला आदमी को काहे की चिन्ता’’

यह बोलते बोलते मैं ख्यालों में खो सा गया। मेरी मुलाकात लक्ष्छू से तब हुई थी। मैं दस साल का था और मेरे पिताजी ने उसे काम पर रखा था।

वह भाग भाग कर घर के सारे काम करता, पानी भरता, पूरे घर का झाड़ू पौंछा करता, उसके बाद खाना लेकर खेत पर चला जाता था। सारे दिन खेत पर काम करता। पिताजी उससे कहते – ‘‘अरे लच्छू खाना खाकर थोड़ा आराम कर लिया कर बहुत धूप हो रही है’’

लक्ष्छू मुस्कुराते हुए कहता ‘‘मालिक अभी पानी देकर आता हूं इन गेंहु की बालियों को धूप लग गई तो भूखे सोना पड़ेगा’’ ऐसी ही हसी ठिठोली करता था लक्ष्छू; मैंने कभी उसे छुट्टी लेते या थक कर आराम करते नहीं देखा।

भरी दोपहरी में मुझे साईकिल से स्कूल लेने पहुंच जाता। वहां मुझे दो टॉफी देकर इंग्लिश के दो चार वाक्य सीखने की कोशिश करता। साईकल पर बैठा कर उड़ता हुआ सा घर पहुंचा देता उसके बाद ही खाना खाता था।

जब मैं स्कूल की पढ़ाई खत्म कर शहर पढ़ने जा रहा था। तो सबके साथ लच्छू भी मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था। वहां पहली बार मैंने उसे रोते देखा था।

एक घर के बुर्जुग की तरह उसने मुझे अपना ख्याल रखने की नसीहत दी और एक कोंने में खड़े होकर रोने लगा। मैंने उसे चुप कराया और पिताजी का ध्यान रखने को कहा। क्योंकि मॉं के जाने के बाद पिताजी किसी से ज्यादा बात नहीं करते थे न ही अपनी परेशानी किसी को बताते थे।

कुछ दिनों बाद मैंने शहर में शादी कर ली पिताजी आये थे लेकिन उनके साथ लच्छू को न देख कर थोड़ी निराशा हुई पूछने पर पिताजी ने कहा – ‘‘वह घर और खेत की जिम्मेदारी संभाल रहा है’’

शादी के तीन साल बाद पिताजी की बीमारी की खबर पाकर मैं दौड़ा-दौड़ा गॉंव पहुंचा। तब बाहर बैठा लच्छू मुझे बहुत कमजोर और लाचार सा नजर आया। जैसे वह कह रहा है कि सब कुछ खत्म होने वाला है।

पिताजी लगता है मेरा ही इंतजार कर रहे थे। मुझसे मिलने के बाद ही उन्होंने प्राण त्याग दिये। मैंने बाहर आकर लच्छू से कहा ‘‘तूने मुझे बताया क्यों नहीं मैं पिताजी को शहर ले जाता’’

लच्छू ने रोते हुए कहा ‘‘बाबूजी ने मना किया था। वे कहते थे मुझे अपने घर के बिस्तर पर मरना मंजूर है पर शहर नहीं जाउंगा।’’

पिताजी की तेहरवीं के अगले दिन मैं लच्छू को घर और खेतों की जिम्मेंदारी देकर वापस चला गया तब से आज आया हूं।

इतने में रघुबीर चाचा ने मेरा ध्यान भंग किया। वो बोले ‘‘बेटा तुम्हारे पिताजी के जाने के बाद लच्छू बहुत अच्छे से तुम्हारी अमानत समझ कर घर और खेत की देखभाल कर रहा था। अकेला रह गया था। फिर भी पूरे गॉव में हसी मजाक करता रहता था।

गॉव वालों ने अगले गॉव से एक लड़की ढूंढ कर उसकी शादी करवा दी। लच्छू शादी के बाद भी बहुत खुश था। उसे बना बनाया खाना मिल जाता था। हसते खेलते समय कट रहा था। लेकिन एक दिन रात को वह लड़की घर का सारा रुपया पैसा लेकर भाग गई। सुबह सबने ढूंढ वह नहीं मिली। बाद में पता चला वह शहर चली गई भाग कर।

लच्छू उस दिन से टूट गया वह उसे बहुत प्यार करता था। अपने प्यार से ज्याद चिन्ता उसे तुम्हारे रुपये और जेवर की थी। उसे लगा कि कलंक लग गया।

वह दिन रात गुमसुम सा बैठा रहता था। कुछ दिन बाद वह पागल हो गया गॉव वालों ने उसका गॉव में आना बंद करवा दिया। अब वह गॉव के बाहर बैठा रहता है।

यह सब सुनकर मैं उससे मिलने को बैचेन हो गया। लेकिन रात हो गई थी। चाचा ने कहा – ‘‘बेटा रात को गॉव के बाहर जाना ठीक नहीं वैसे भी वह पागल है सुबह जाकर उससे मिल लेना’’

चाचा से अपने घर की चाबी लेकर मैं घर में बने आंगन में खाट बिछा कर सो गया। लेकिन नींद कहां थी पूरी रात करवट बदलता रहा।

सुबह तड़के ही मैं लच्छू से मिलने पहुंच गया। वहां जाकर देखा तो मैं उसे पहचान नहीं पाया वह बिल्कुल कमजोर हो गया था। आंखे गढ्ढो में धस गईं थी। आधे से ज्यादा बाल सफेद हो चुके थे। कपड़े फटे हुए थे। वह खेत के पास बैठा था।

उसे देखकर मुझे झटका लगा कि क्या यह वही जिन्दा दिल इंसान है जिससे हमारा पूरा घर और पूरा गॉव चहकता रहता था। वह अपनी बातों से हर किसी को हसा देता था। सबसे राम राम करना सबका आशीर्वाद लेना। आज उसकी आंखो में एक सूनापन था। मुझे एकटक देख रहा था।

शायद उसे कुछ याद आया और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। मुझे वह कहीं से पागल नहीं लगा। कुछ देर बाद वह कहने लगा। ‘‘भैया मुझे माफ कर दो बाबूजी की अमानत मैं बचा न सका’’

इससे पहले मैं कुछ बोलता वह वहां से खेतों की ओर भाग गया। मैं निराश होकर वापस आ गया।

कुछ दिन बाद रघुबीर चाचा का फोन आया उन्होंने बताया कि पगला लच्छू नहीं रहा।

मेरा मन ऑफिस में नहीं लग रहा था। मैं घर आ गया। घर आकर मैंने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया। मैंने देखा मेरी आंखों से पानी बह रहा है। मेरा कोई रिश्ता नहीं था लच्छू से बस उसके व्यवहार के कारण मैं दुःखी था। इतने अच्छे इंसान का अंत ऐसे नहीं होना चाहिये था।

Anil Sharma is a Hindi blog writer at kathaamrit.com, a website that showcases his passion for storytelling. He also shares his views and opinions on current affairs, relations, festivals, and culture.