Shiv Ji ki Sacchi Kahani | एक बहेलिये की शिव भक्ति

Shiv ji ki Sacchi Kahani

Shiv Ji ki Sacchi Kahani : एक गॉव में हरिया नाम का एक बहेलिया रहता था वह गॉव में जाल बिछा कर चिड़िया, कबूतर, तोता और अन्य पक्षियों को पकड़ता था फिर उन्हें पिंजरे में बंद करके रख लेता और गॉव के बाजार में बेच देता था।

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हरिया के घर में उसकी पत्नि शोभा भगवान शिव की भक्त थी वह दिन रात भगवान शिव की पूजा करती थी। शोभा अपने पति के काम से खुश नहीं थी। एक दिन उसने ने हरिया से कहा ‘‘सुनो जी तुम जिन पक्षियों को पकड़ कर बेचते हो इससे उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी’’

उसकी बात सुन कर हरिया हसने लगा और उसने कहा ‘‘तुझे कैसे पता इन्हें तकलीफ होती है इन्हें बाजार में बेचने से मुझे अच्छे पैसे मिलते हैं।’’

यह सुनकर शोभा रोने लगी उसने कहा ‘‘आपको शायद यह नहीं पता कि इन भोले बेजुबान पक्षियों की हाय हमें लग रही है इसी कारण हमारे कोई सन्तान नहीं है। मैं दिन रात भगवान शिव की पूजा करती हूं लेकिन फिर भी हम सन्तान के सुख से वंचित हैं।’’

तब हरिया ने कहा ‘‘मैं यह सब नहीं मानता तू भी इस सबके बारे में सोचना छोड़ दे’’ यह कहकर हरिया पक्षी पकड़ने चल देता है।

शाम को हरिया पिंजरे में पक्षीयों को लेकर आता है और झोपड़ी में रख देता है। अगले दिन फिर से हरिया पक्षीयों को पकड़ने चला जाता है।

तभी कोई घर का दरवाजा खटखटाता है। शोभा दरवाजा खोल कर देखती है तो उसके सामने एक ब्राह्मण अपनी पत्नि के साथ खड़े थे। शोभा उनसे कहती है। ‘‘महाराज आप लोग कौंन हैं।’’

तब ब्राह्मण कहता है ‘‘बेटी हम बहुत दूर से कुछ दिन इस गॉव के शिव मन्दिर में अमर कथा वाचने आये हैं। इसलिए घर घर जाकर उसका निमंत्रण दे रहे हैं। तुम भी कल से अपने परिवार के साथ कथा सुनने आना।’’

यह सुनकर शोभा बहुत खुश हुई उसने कहा ‘‘हे ब्राह्मण देवता मेरे तो भाग्य खुल गये ऐसा अवसर तो किस्मत वालों को मिलता है। परन्तु आप दोंनो की रहने की व्यवस्था कहां है।’’

तब ब्राह्मण ने कहा ‘‘बेटी मन्दिर के पंडित जी ने हमारा रहने का इंजताम मन्दिर में ही कर दिया है। और इस गॉव में जो भी हमें सम्मान और प्यार से भोजन करायेगा हम भोजन कर लेगें’’

यह सुनकर शोभा की आंखो से आंसू बहने लगे उसने रोते हुऐ कहा ‘‘महाराज मैं बहुत गरीब हूं लेकिन मेरी इच्छा है कि जब तक आप इस गॉव में रहें आप मेरे घर में भोजन करें परन्तु मेरे घर में रूखा सूखा है जो आपको पसंद नहीं आयेगा’’

यह सुनकर ब्राह्मण की पत्नि बोली ‘‘बेटी तुम चिन्ता मत करो यदि तुम्हारी इच्छा हमें भोजन कराने की है तो हर दिन हम तुम्हारे घर में ही भोजन करेंगे तुम्हारे रूखे सूखे एक निवाले से ही हमारी तृप्ति हो जायेगी’’

यह सुनकर शोभा बहुत खुश हो गई उसने कहा ‘‘मैं आपके लिए भोजन तैयार करती हूं’’

तब ब्राह्मण ने कहा ‘‘माई तुम भोजन तैयार करो हम पूरे गॉव में निमंत्रण देकर तुम्हारे घर आयेंगे।’’

यह कहकर दोंनो चले जाते हैं।

शोभा भोजन तैयार करती है। कुछ समय बीत जाने के बाद दोंनो पति पत्नि शोभा के घर भोजन करने आ जाते हैं। जब वे भोजन करने बैठते हैं। तभी ब्राह्मण की नजर पिंजरे में पक्षियों पर पड़ती है। वे उठ कर खड़े हो जाते हैं। शोभा उनसे पूछती है ‘‘महाराज क्या मेरे से कोई भूल हो गई’’

ब्राह्मण ने श्चोधित होते हुए कहा ‘‘तुमने इन बेजुबान पक्षियों को पिंजरे में कैद कर रखा है। हम तुम्हारे घर भोजन नहीं कर सकते। तुम भगवान शिव की अमर कथा सुनना चाहती हों और उनके प्रिय कबूतरों को तुमने कैद कर रखा है।’’ यह कहकर वे चल देते हैं।

शोभा उनके पैर पकड़ लेती है और कहती है ‘‘हे ब्राह्मण देवता मेरे घर से रुष्ट होकर न जाईये मैं तो वैसे भी संतान सुख से वंचित हूं। अगर आप भी बिना भोजन किये चले गये तो हमारा सर्वनाश निश्चित है। यह पक्षी मेरे पति ने पकड़े हैं। मैं अभी इन्हें आजाद कर देती हू°।’’

यह कहकर वह बाहर जाकर सारे पक्षियों को आजाद कर देती है। यह देख कर ब्राह्मण पत्नि सहित भोजन करते हैं और शोभा को सौभाग्यवती और पुत्रवती होने का आशीर्वाद देकर चले जाते हैं।

शाम को जब हरिया आता है। वह पिंजरा खाली देखकर शोभा से पूछता है। तब शोभा उसे सारी घटना बता देती है। हरिया गुस्से में कहता है ‘‘मैं इतनी मेहनत से पक्षी पकड़ कर लाया था और तूने सब उड़ा दिये आज के बाद किसी को भोजन पर मत बुलाना’’

तब शोभा कहती है ‘‘मैंने तो उन दोंनो को सातो दिन का न्यौता दे दिया है अब मैं पीछे नहीं हट सकती है उन्होंने मुझे सौभाग्वती और पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया है अमरकथा वाचने वाले सच्चे ब्राह्मण का आशीर्वाद कभी बेकार नहीं जाता। अगर उन्हें भोजन नहीं कराया और उन्होंने गुस्से में श्राप दे दिया तो हमारा सर्वनाश हो जायेगा। आप केवल सात दिन तक पक्षियों को मत पकड़ना बाद में जो चाहें करना।’’

हरिया को हार कर उसकी बात माननी पड़ी वह बे मन से सात दिन घर पर ही रहने लगा। हर दिन ब्राह्मण और उनकी पत्नि भोजन करने आते उनके आने से पहले हरिया घर से चला जाता उसे यह सब पसंद नहीं था। शाम के समय शोभा कथा सुनने जाती वह हरिया से भी चलने को कहती लेकिन हरिया मना कर देता था।

इसी तरह 6 दिन बीत गये रात को शोभा ने हरिया से कहा ‘‘आपने मेरे कहने से छह दिन पक्षियों को नहीं पकड़ा बस आप मेरी एक बात और मान लीजिए’’

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हरिया ने कहा ‘‘क्या बात है वैसे भी मैं केवल कल ही घर पर रुकूंगा परसों से अपने काम पर जाउंगा’’

तब शोभा ने कहा ‘‘कल अमर कथा समाप्त हो जायेगी मैं चाहती हूं आप कल मेरे साथ मन्दिर में कथा सुनने चलें और वहां से वापास आने के बाद ब्राह्मण और उनकी पत्नि को अंतिम बार भोजन करा कर उनसे आशीर्वाद लें। क्या पता उनके आशीर्वाद से हमें सन्तान का सुख मिल जाये।’’

हरिया उसकी बात सुन कर अगले दिन कथा सुनने चल देता है।

मन्दिर में कथा सुनते सुनते हरिया की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। शोभा के पूछने पर वह कहता है ‘‘भगवान शिव ने जिन कबूतरों को अमरता का आशीर्वाद दिया मैंने जीवन भर उन्हें बेच कर अपना जीवन नरक बना लिया।’’ कथा समाप्त होने पर वे दोंनो घर आ गये।

हरिया का मन निर्मल हो गया था उसने शोभा से कहा ‘‘मैं आज से ही यह काम छोड़ दूंगा और मेहनत मजदूरी करूंगा’’

कुछ देर बाद ब्राह्मण और उनकी पत्नि भोजन करने आये। हरिया ने उनका स्वागत किया उन्हें भोजन कराया उसके बाद हरिया ने अपने मन की सारी बात उनके सामने रख दी।

तभी ब्राह्मण और उनकी पत्नि भगवान शिव और मॉं पार्वती के रूप में प्रकट हो जाते हैं। भगवान शिव कहते हैं ‘‘तुम्हारी पत्नि की भक्ति देख कर हम तुम्हें संतान सुख देना चाहते थे किन्तु तुम्हारे पाप के कारण यह संभव नहीं था इसलिए हमें तुम्हारा मन बदलने के लिए भेष बदल कर यहां आना पड़ा’’

यह सुन कर दोंनो पति पत्नि रोने लगते हैं और उनके चरणों गिर जाते हैं। भगवान शिव और मॉं पार्वती उन्हें पुत्रवती होने का आशीर्वाद देकर अर्न्तध्यान हो जाते हैं।

भगवान के आशीर्वाद से उनके घर एक सुन्दर कन्या का जन्म होता है। कन्या के आने के बाद उनके दिन बदल जाते हैं। वे काफी धनवान हो जाते हैं।

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