शरद पूर्णिमा व्रत, पूजन विधि व व्रत कथा | Sharad Purnima Vrat Katha

sharad purnima vrat katha

Sharad Purnima Vrat Katha : शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। मान्यता है कि सम्पूर्ण वर्ष में केवल इसी दिन चन्द्रमा षोडश कलाओं का होता है। इस दिन कार्तिक स्नान करके श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त करने की कामना की जाती है।

देवी पूजन करने वाली कुमारियों को चीरहरण के अवसर पर दिए वरदान की याद आई थी और उन्होंने मुरलीवादन करके यमुना के पुलिन पर गोपियों के साथ रास रचाई थी।

इस दिन श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान् विष्णु का पूजन करने से तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं और वे पति के रूप में सहज ही स्वीकार्य हो जाते हैं।

शरद पूर्णिमा पूजन विधि (Sharad Purnima Pujan Vidhi)

  • आश्विन मास शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल आराध्यदेव विष्णु को सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुशोभित करके आसन, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी, दक्षिणा आदि से पूजन करना चाहिए।
  • रात्रि के समय गो-दूग्ध से बनी खीर में घी तथा चीनी मिलाकर पूरियों की रसोई सहित अर्द्धरात्रि के समय भगवान् को भोग लगाना चाहिए। रात्रि जागरण करके भगवद् भजन करना चाहिए।
  • चाँद की रोशनी में सुई पिरोएं।
  • पूर्ण चंद्रमा के आकाश के मध्य में स्थित होने पर उसका पूजन करें।
  • खीर से भरी थाली रात को खुली चाँदनी में रहने दें। दूसरे दिन उसका सबको प्रसाद दें तथा स्वयं खाएँ।
  • पूर्णिमा का व्रत करके कहानी सुननी चाहिए। कथा सुनते समय एक लोटे में जल, गिलास में जल, दोनों में रोली तथा चावल रखें। कलश की वंदना करके दक्षिणा चढ़ाएं टीका काढ़ें।
  • गेहूँ के तेरह दाने हाथ में लेकर कथा सुनें, फिर गेहूँ के गिलास पर हाथ फेरकर मिश्राणी के पाँव का स्पर्श करके गेहूँ का गिलास उसे दे देवें। लोटे के जल को रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें।
  • विवाह होने के बाद पूर्णमासी के व्रत का नियम शरद पूर्णिमा से ही लेना चाहिए।
  • कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही आरम्भ करना चाहिए।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा Sharad Purnima Vrat Katha

एक साहूकार की दो पुत्रियाँ थीं। दोनों पूर्णमासी का व्रत करती थीं। बड़ी बहन तो पूर्ण व्रत करती, पर छोटी अधूरा छोड़ देती थी। छोटी बहन के जो भी संतान होते वे सब जन्म लेते ही मर जाते थे, पर बड़ी बहन की सारी संतानें जीवित रहते।

एक दिन छोटी बहन ने बड़े-बड़े पंडितों को बुलाकर अपना दुःख निवेदित किया तथा कारण पूछा। पंडितों ने बताया कि तुम शरद पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती हो, इसलिए तुम्हारी संतानों की अकाल मृत्यु हो जाती है। शरद पूर्णिमा का विधिपूर्वक पूर्ण व्रत करने से तुम्हारी संतानें जीवित रहा करेंगी।

उसने वैसा ही किया। उसका एक लड़का हुआ और वह शीघ्र ही मर गया। उसने उस लड़के को पीढ़े में सुलाकर कपड़ा ढक दिया। बड़ी बहन को बुलाया और बैठने के लिए वही पीढ़ा दे दिया। बड़ी बहन के बैठने से ज्योंहि उसका घाघरा बच्चे से छुआ, वह रोने लगा।

बड़ी बहन ने कहा,- ‘तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। यदि मैं बैठ जाती तो लड़का मर जाता।’ तब छोटी बहन बोली,- ‘यह तो पहले से ही मरा हुआ था। तेरे भाग्य से जीवित हुआ है।

हम दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत करती हैं। तूम पूरा करती है और मैं अधूरा, जिसके दोष से मेरी संतानें मर जाती हैं। इसलिए तेरे ही पुण्य से यह बालक जीवित हुआ है।

उसके बाद उसने नगरभर में पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया। उस दिन से शरद पूर्णिमा का प्रचार-प्रसार पूरे संसार में हुआ और आज भी लोग बड़े ही श्रद्धा एवं भक्ति के साथ इस व्रत को करते आ रहे हैं।