Kadli Rambha Vrat Katha : भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को रम्भा अथवा कदली व्रत को बड़े ही श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। गुजरात आदि राज्यों में वैशाख कार्तिक तथा माघ शुक्ल चतुर्दशी को भी इस व्रत का अनुष्ठान किया जाता है।
इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण तथा कदली वृक्ष का पूजा-अर्चना विधि-विधान के साथ किया जाता है। इस व्रत को स्त्री-पुरुष दोनों ही समान रूप से कर सकते हैं।
इस दिन व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करने से मनुष्य कठिन से कठिन समस्याओं पर विजय पा लेता है।
इसलिए जब मनुष्य के समक्ष कोई विकट समस्या उत्पन्न हो गयी हो तब इस व्रत का अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। इससे न केवल आत्मरक्षा होती है, वरन् अन्त में स्वर्ग की भी प्राप्ति होती है।
कदली रम्भा व्रत करने की विधि (Kadli Rambha Vrat Karne ki Vidhi)
रम्भा व्रत के एक वर्ष पूर्व से ही कदलीवृक्ष का अपने हाथों से रोपन कर विधिवत् पालन-पोषण करें। नित्य जल से सींचे और जब उसमें फल लगना आरम्भ हो जाय, तब उस वृक्ष की पूजा के लिए इस व्रत का अनुष्ठान करें।
भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर दिनभर का उपवास रखने के बाद कदलीवृक्ष के समीप बैठकर फल, पुष्प, धूप, दीपादि से विधिवत् पूजन करें।
सप्तधान्य, रक्त चंदन, घृत का दीपक, दही दूर्वा, अक्षत, वस्त्र, नैवेद्य, जायफल, सुपारी चढ़ाएं और सात बार प्रदक्षिणा कर उपयुक्त मंत्र से प्रार्थना करें।
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इस प्रकार तीन-चार वर्षोंतक इस व्रत के करने से कुल में कुलटा स्त्रियाँ नहीं होती और पुत्र-पौत्रादि के साथ सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
व्रत की समाप्ति के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर विदा करें और अन्त में अल्पाहार कर व्रत तोडें।
कदली रम्भा व्रत-कथा (Kadli Rambha Vrat Katha)
द्वापरकाल में एक बार रुक्मिणी ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा कि अक्षय सौभाग्य एवं सुख-समृद्धि के लिए उसे कौन सा व्रत करना चाहिए?
भगवान् श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को यही रम्भा व्रत करने का उपदेश दिया और इसकी विधि भी बतलाई। रुक्मिणीजी ने विधिपूर्वक इस व्रत का पालन किया और उनकी अभिलाषा पूर्ण हुई। उसे अक्षय सौभाग्य और सुख-समृद्धि का फल मिला।
इस घटना के अनन्तर पाण्डवों का दुर्योधन के साथ जुए में हार जाने का संवाद संसार में प्रचलित है। जिसमें दुःशासन के द्वारा द्रोपदी के बीच सभा में अपमानित किये जाने की दुःखद घटना घटित हुई। निराश और निरुपाय द्रोपदी ने दुःशासन की अनीति से बचने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण की गुहार लगाई।
भगवान् ने रुक्मिणी से रम्भा व्रत के पुण्यफल के कुछ अंश द्रोपदी को देने का सुझाव दिया। रुक्मिणी ने ऐसा ही किया।
फिर तो इस व्रत के आंशिक पुण्य फल से द्रोपदी की चीर बढ़ती चली गयी। दश सहस्र हाथियों का बल रखने वाला दुःशासन हार गया और द्रोपदी की चीर उत्तरोतर बढ़ती चली गयी।
उस समय से स्वयं की आत्मरक्षा, धन-सम्पति तथा स्वर्गलोक की कामना करनेवाले लोगों में यह व्रत और भी अधिक प्रचलित हो गयी।


















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