गणेश चतुर्थी पूजन विधि | Ganesh Chaturthi Pujan Vidhi Vrat Katha

Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi Pujan Vidhi Vrat Katha : समस्त देवी देवताओं के पूज्य माने जाने वाले गणेशजी का पूजन का पर्व भाद्र मास शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।

भाद्र मास की शुक्लपक्ष चतुर्थी तिथि को समस्त हिन्दु-परिवार में विघ्नहर्ता गणेशजी की पूजा-अर्चना की जाती है।

ऐसा माना जाता है कि उस दिन गणेश भगवान् अपने भक्तों का भरपूर ध्यान रखते हैं और उन्हें आशीर्वाद एवं स्नेह प्रदान करते हैं।

गणेशजी के बारे में सर्वविदित है कि उनके जीवन काल में अनेक कठिन समय आये। तब उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय दिया।

जब उनके सामने पूरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा कर आने जैसी कठिन प्रतियोगिता को अपने मूशक की सवारी के सहारे जीतने का सवाल आया। तब उन्होंने तत्काल अपने माता-पिता की परिक्रमा कर डाली और यह तर्क भी दिया कि जिनके चरणों में तीनों लोक हैं, उनकी परिक्रमा ही जब कर ली तो फिर और क्या बचा? इस प्रकार की बुद्धि की लालसा हेतु ही हर भक्त अपने विनायक की पूजा-अर्चना करता है।

गणेश चतुर्थी पूजन विधि

भादपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर अपनी शक्ति के अनुसार सोने, चाँदी, ताँम्बे, मिट्टी अथवा गोबर से निर्मित गणेशजी की प्रतिमा बनावें।

फिर नये कलश में जल भरकर उसके मुख को नुतन वस्त्र से ढँककर उसी पर गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें।

तदन्तर पुराणों में वर्णित गणेशजी की गजानन, लम्बोदर की मूर्ति का ध्यान करते हुए विधिपूर्वक पूजन करें।

आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, आचमन, वस्त्र, गन्ध, पुष्पादि चढ़ाते हुए गणेशजी को नमस्कार करें और अंग पूजा करें।

इस अंग पूजा में पाद, जंघा, उरु, कटि, नाभि, उदर, स्तन, हृदय, कण्ठ स्कन्ध, हाथ, मुख, ललाट, शिर, आदि सर्वांग का पूजा करें तथा धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बुल और दक्षिणा के पश्चात् आरती करके नमस्कार करें।

इस पूजा में  लड्डू  भी रखना चाहिए। उनमें से पाँच तो गणेश प्रतिमा के आगे और शेष ब्राह्मणों को देने के लिए रखें।

बाद में ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दक्षिणा दें। रात्रि में जब चन्द्रमा का उदय हो तब चन्द्रमा का यथाविध पूजन करें तथा अर्घ्य प्रदान करें। तदन्तर यह कथा सुनें

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गणेश चतुर्थी व्रत कथा

कैलास शिखर पर निवास करते समय एक बार शंकरजी ने पार्वती को अकेला छोड़कर भोगवतीपूरी के लिए स्नानार्थ प्रस्थान किये।

शिवजी के चले जाने के अनन्तर पार्वती ने इस विचार से कि कोई परकीय पुरुष आश्रम में न आ जाय, अपने शरीर के मल से एक पुतला बनाया और उसे अमृत सिंचित जल डालकर सजीव बना लिया।

फिर पार्वती ने उसे आज्ञा दी, पुत्र मुद्गर लेकर आश्रम के द्वार पर बैठो। जब तक मैं आज्ञा न दूँ, कोई भी पुरुष भीतर न आने पावे।’

पार्वतीजी स्नानादि से निवृत्त होेकर शंकरजी के लिए विविध व्यंजन तैयार करने लगी। उधर संयोग से शंकरजी भोगवती पूरी से स्नान कर आ गये। पर द्वार में नियुक्त पार्वतीजी के गण ने शंकरजी का मार्ग रोक दिया और उनसे कहा,- ‘जबतक माता की आज्ञा नहीं हो जाती मैं आपको अन्दर नहीं जाने दूँगा।’ अपने ही आश्रम में इस प्रकार का अपमान होता देखकर शंकरजी क्रुध हो गये।

उन्होंने उसका सिर काट डाला और क्रोध से भरे हुए अपने आश्रम में प्रवेश किया। पार्वतीजी ने शंकर की कोप मुद्रा को देखकर अनुमान लगाया कि कदाचित भूख की अधिकता के कारण विलम्ब हो जाने से ही शंकरजी अप्रसन्न हो गये हैं।

वह जल्दी से रसोई में गयी और थाली में भोजन परोस कर ले आई। दो पात्रों में भोजन देखकर शंकरजी ने पूछा,- ‘यह दूसरा भोजन किसके लिए लायी हो?’

पार्वती ने अपना छोटा पुत्र मान चुकी गण के बारे में कहा,- ‘बेचारा बड़ी देर से भूखा प्यासा द्वार पर मेरी रखवाली कर रहा है।

यह दूसरी थाली उसी के लिए लाई हूँ।’ शंकरजी ने कहा,- ‘अरे! उसे तो मैंने मार डाला है।

वह अत्यन्त मूर्ख तथा दुराग्रही था। बहुत समझाने पर भी उसने मुझे आश्रम में नहीं घुसने दिया।’ पार्वती को उसे मारे जाने की बात सुनकर बड़ा क्लेश हुआ।

उसे वह अपना पुत्र बना चुकी थी। वह विह्ल होकर बोली,- ‘हे नाथ! इसमें उसका क्या दोष था? मैंने ही उसे ऐसा करने की आज्ञा दी थी।

आप उसे अभी जीवित करेगें नहीं तो मैं जीवन धारण नहीं करूँगी।’

शंकरजी निरुपाय थे। पार्वती के कथन में सत्य का बल था। उन्हें विवश होकर पार्वती की इच्छा पूर्ण करनी पड़ी।

अपने एक गण को उन्होंने आज्ञा दी,- ‘जाओ पहले जो जीव दिखाई दे उसका सिर काटकर ले आओ।’ शिवजी की आज्ञा से जैसे ही वह गण बाहर गया जंगल में घूमता हुआ एक हाथी दिखाई पड़ा।

उसने उस हाथी का सिर काट लिया और शंकरजी को लाकर समर्पित कर दिया। अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार शंकरजी ने उस हाथी का सिर जोड़कर उसे जीवन प्रदान किया। पार्वती अपने पुत्र को जीवित देखकर बड़ी प्रसन्न हुई।

उन्होंने दोनों को एक साथ भोजन करायी और उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर शंकरजी के द्वारा समस्त गणों का स्वामी बनवा दिया। यह घटना भाद्रपद की शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को घटित हुई थी। तभी से हिन्दु-समाज में गणेशजी की पूजा की यह पवित्र परम्परा चली आ रही है।